पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है ध्वनि प्रदूषण
मोबाइल टावरों की तरंगें
ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षी अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियां नहीं कर पा रहे, प्रजनन नहीं कर पा रहे और उनका नेविगेशन भी बाधित हो रहा है।
ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षी अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियां नहीं कर पा रहे, प्रजनन नहीं कर पा रहे और उनका नेविगेशन भी बाधित हो रहा है। पक्षियों के लिए ध्वनि केवल एक आवाज नहीं, बल्कि उनके पूरे अस्तित्व का आधार है। उनका अस्तित्व, संचार, प्रजनन, दिशा निर्देशन और अनेक अन्य प्रक्रियाएं ध्वनि पर आधारित हैं। वर्तमान समय में स्थिति ऐसी हो गई है कि जैसे जैसे शहरों में शोर बढ़ता गया है और मानवीय गतिविधियां बढ़ी हैं, वैसे वैसे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता गया है। पक्षी आवाज के माध्यम से ही एक दूसरे से संवाद करते हैं। उनकी ध्वनि की तीव्रता में ही उनका प्रेम, उनका विरोध, उनका भय, उनके संकेत, अपने क्षेत्र की रक्षा, सामाजिक संरचना और परिवार की पहचान सब कुछ समाहित होता है।
विभिन्न प्रकार के प्रदूषण :
आज का कोलाहल इन सबको बिखेर रहा है। पक्षी अपने स्वर, गीत और नृत्य के माध्यम से साथी का चयन करते हैं। चारों ओर बढ़ते शोर के कारण उन्हें अपने स्वर और गायन में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह परिवर्तन उनकी समस्या का अस्थाई समाधान हो सकता है, लेकिन इसकी मधुरता और प्रभाव कम हो गए हैं। शहरीकरण और तकनीकी विकास की दौड़ में आज दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। इस विकसित होते संसार में जो समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। विकास के मार्ग पर दौड़ती दुनिया ने चारों ओर विभिन्न प्रकार के प्रदूषण फैला दिए हैं। इस तेज रफ्तार दुनिया में एक ऐसा प्रदूषण बढ़ा है, जिसकी अब भी खुलकर अनदेखी की जा रही है, वह है ध्वनि प्रदूषण।
पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित :
यह नुकसान पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर देता है। पर्यावरण को इससे जो हानि पहुंचती है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। विशेषज्ञों के अनुसार ध्वनि प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव पक्षियों पर पड़ा है। पक्षियों का पूरा जीवन ध्वनि पर आधारित है। पक्षियों के लिए ध्वनि केवल एक आवाज नहीं, बल्कि उनके संपूर्ण अस्तित्व का आधार है। उनका अस्तित्व, संचार, प्रजनन, दिशा निर्देशन और अनेक अन्य क्रियाएं ध्वनि पर निर्भर हैं। हमारे आसपास कभी कोयल की कूक सुनाई देती थी, मोर की पुकार गूंजती थी, चिड़ियों की चहचहाहट होती थी, कबूतरों की गुटरगूं सुनाई देती थी। इसके अलावा मैना, तोता, कबूतर, कौआ, बुलबुल और अनेक अन्य पक्षी हमारे आसपास निवास करते थे। उनका स्वर हमें मंत्रमुग्ध कर देता था।
प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर :
विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक पक्षी अपने आवास के अनुसार,एक विशिष्ट स्वर, उसकी शैली, उसकी सीमा और उसके गुण विकसित करता है। उसी के माध्यम से वह अपना संचार तंत्र विकसित करता है। अब स्थिति यह हो गई है कि वाहनों के कारण चारों ओर ट्रैफिक बढ़ रहा है, निर्माण कार्य चल रहे हैं,औद्योगिक मशीनें शोर कर रही हैं, विमानों की आवाज गूंज रही है, शहरी क्षेत्रों में कोलाहल बढ़ रहा है और शहर फैलते हुए जंगलों को कम कर रहे हैं। इन्हीं शहरी क्षेत्रों में पक्षी रहने के लिए मजबूर हो गए हैं। इसके कारण उनकी आवाज दब गई है। जब वे आपस में संवाद करते हैं, तो बाहरी शोर के कारण कठिनाई होती है। उनका संवाद बाधित हो जाता है। इस शोर और कोलाहल के कारण कई पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और अनेक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं।
ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव :
चिंताजनक बात यह भी है कि ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव पक्षियों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, पक्षी अपने स्वर, गायन और नृत्य के माध्यम से साथी का चयन करते हैं। जोड़ी बनाने में उनका स्वर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक और गंभीर प्रभाव यह है कि पक्षियों में तनाव का स्तर बढ़ गया है। ध्वनि प्रदूषण के कारण वे शिकारी की पहचान नहीं कर पाते, खतरे के संकेतों को समझ नहीं पाते और सतर्क नहीं हो पाते। सामान्यतः प्राकृतिक वातावरण में पत्तों की सरसराहट, टहनियों की आवाज, अन्य पक्षियों की चेतावनी या भय का संकेत बाकी पक्षियों को सावधान कर देता है। लेकिन जंगल घटे हैं और शोर बढ़ा है, परिणामस्वरूप उन्हें लगातार सतर्क रहना पड़ता है। उनकी नींद, विश्राम, भोजन और अन्य गतिविधियों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
मोबाइल टावरों की तरंगें :
मनुष्य द्वारा फैलाए जा रहे ध्वनि प्रदूषण, कृत्रिम प्रकाश प्रदूषण और मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण भी पक्षियों को भारी नुकसान हुआ है। कृत्रिम प्रकाश प्रदूषण भी पक्षियों के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। अनेक मामलों में देखा गया है कि तेज रोशनी के कारण पक्षी भ्रमित हो जाते हैं और इमारतों से टकरा जाते हैं। दिन में भी बड़ी इमारतों के रिफ्लेक्टिव कांच से परावर्तित सूर्यप्रकाश उनकी आंखों को चकाचौंध कर देता है, जिससे दुर्घटनाएं होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थिति ऐसी बन रही है कि पक्षियों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है या वे अपना आवास छोड़कर अन्य स्थानों पर जाने लगे हैं। इसका प्रभाव बीज प्रसार, कीट नियंत्रण और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर पड़ रहा है। पर्यावरण की खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित हो रही है।
-स्नेहा सिंह
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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