क्या वैश्विक राजनीति का अखाड़ा बनेगा ग्रीनलैंड

स्वायत्तता मजबूत है 

क्या वैश्विक राजनीति का अखाड़ा बनेगा ग्रीनलैंड

वेनेजुएला में सैन्य अभियान के बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, उसके तेल भंडारों पर नियंत्रण के बाद क्या अब ग्रीनलैंड का नंबर आने वाला है ?

वेनेजुएला में सैन्य अभियान के बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, उसके तेल भंडारों पर नियंत्रण के बाद क्या अब ग्रीनलैंड का नंबर आने वाला है? यह आशंका इसलिए बलवती हो रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे के प्रस्ताव को दोहराया है। यह उनकी अमेरिका प्रथम नीति का हिस्सा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों पर केंद्रित है। चुनाव दौरान उनके ड्रील बेबी ड्रील नारे का मर्म अब दुनिया को समझ में आने लगा है। खरीद का प्रस्ताव भी ट्रंप ने पहली बार वर्ष 2019 में ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था। पिछले साल कहा था-मुझे लगता है हमें यह मिल जाएगा। किसी न किसी तरह से किसी दूसरे तरीके से ही। पहले खरीद का प्रस्ताव, फिर नकद भुगतान योजना प्रति व्यक्ति दस हजार से एक लाख डॉलर तक का। विदेश मंत्री मार्को रुबियो डेनिश अधिकारियों से बातचीत की योजना बना रहे हैं।

ग्रीनलैंड पर दावा :

इसके पीछे यह सोच भी हो सकती है कि डेनमार्क ने वर्ष 1917 में कैरेबियन क्षेत्र में अपनी कई कॉलोनियों को अमेरिका को बेचा था। ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने वर्ष 1867,1946 और 1950 में भी ग्रीनलैंड पर दावा किया था। लेकिन ट्रंप ने इसे आधुनिक स्वरूप दिया है। ग्रीनलैंड के प्रति रुख आक्रामक और रणनीतिक रूप से प्रेरित रहा है। ताकि चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियों के बीच नाटो क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यूरोपीय देशों का विरोध इस पर यूरोपीय देशों में खलबली मची हुई है। उनके नेताओं ने ट्रंप के प्रस्ताव पर कड़ा विरोध जाहिर किया है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और यूनाइटेड किंगडम के नेताओं ने इस मामले पर डेनमार्क के साथ खड़ा होने का दावा किया हैं। डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने कहा है कि ग्रीनलैंड अपने लोगों का है और यहां के मामलों पर केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड का अधिकार है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति :

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इस पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि ट्रंप को यूरोपीय देश हल्के में नहीं लें। कुछ शत्रु देश ग्रीनलैंड में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यह जगह सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया को मिसाइली हमलों से बचाने के लिए जरूरी है। दूसरी ओर राष्ट्पति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयार्क टाइम्स को दिए अपने साक्षात्कार में कहा है कि उनमें जो आक्रामकता है, सिर्फ और सिर्फ खुद वही रोक सकते हैं। वे किसी अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून और संधि को नहीं मानते। यह क्षेत्र डेनमार्क का स्व-शासित क्षेत्र है। डेनमार्क नाटो का सदस्य राष्ट्र है। उन्होंने चेताया कि अमेरिकी कब्जा नाटो का अंत हो सकता है। यानी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी हमारी सुरक्षा व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

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सबसे बड़ा द्वीप है :

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डेनमार्क जिसने 300 सालों तक ग्रीनलैंड पर नियंत्रण बनाए रखा, वह आज उतनी बड़ी सैन्य शक्ति नहीं है जितनी 17वीं सदी में था। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है जो रूस की पनडुब्बियों और चीन के जहाजों पर निगरानी रखने के लिए आदर्श है। ट्रंप के अनुसार यह क्षेत्र चीनी और रूसी नौसेनाओं से घिरा हुआ है, इसलिए अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जो उत्तरी धु्रव के पास स्थित है और औपचारिक रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है। इसका स्थान उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक समुद्र के बीच में है जिस वजह से यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तरी अमेरिका-यूरोप के बीच मुख्य नौसैनिक और वायु मार्गों के नजदीक है। यह रूस की उत्तरी नौसेना और चीन के आर्कटिक में बढ़ते प्रभाव की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण चोक पॉइंट में पड़ता है।

संसाधनों का खजाना :

इसका विशाल क्षेत्र में असंख्य प्राकृतिक संसाधन जैसे दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और खनिज पाए जाते हैं जो आधुनिक तकनीक, रक्षा और ऊर्जा उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। 36 अरब टन दुर्लभ खनिज, 60 लाख टन ग्रैफाइट, 2.35 लाख टन लीथियम, 28 अरब कच्चे तेल का भंडार है। जलवायु परिवर्तन से तेजी से पिघलते आर्कटिक बर्फ की वजह से यह क्षेत्र पहले से अधिक सुलभ हो गया है जिससे नई शिपिंग लाइंस और संसाधन खनन संभावनाएं खुल गई हैं। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर आक्रामक रुख अपनाता है तो नाटो गठबंधन में भरोसे की कमी पैदा कर सकता है। कुछ ग्रीनलैंड के नेताओं का मानना है कि अमेरिकी दबाव स्वायत्तता और आजादी की आकांक्षा को तेज करेगा जो एक स्वतंत्र देश बनने की दिशा में हो सकता है।

स्वायत्तता मजबूत है :

ग्रीनलैंड के नेता जेन्स फ्रेडरिक नेलसन ने विलय को खारिज करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चेतावनी दी है कि हमला नाटो का अंत होगा। ग्रीनलैंड का रक्षा कानून 1952 का है, जो आक्रमण पर गोली चलाने की अनुमति देता हैं। यहां 57 हजार की जनसंख्या है। लेकिन स्वायत्तता मजबूत है। यहां की रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के पास है। रक्षा मंत्री ने चेतावनी दी है कि कोई विदेशी ताकत यहां हमला करती है, तो उसका जवाब गोली से मिलेगा। उसके संसाधनों पर कब्जा करने से अमेरिका को आर्कटिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन असफलता नाटो और यूरोप से संबंधों को बिगाड़ देगी। पनामा और कनाडा जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी उनकी नजर, विस्तारवाद के रूप में मानी जाएगी। कुल मिलाकर ट्रंप का रुख दृढ़ है, लेकिन कूटनीतिक बाधाएं बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठते हैं- क्या शक्तिशाली देशों को कमजोर क्षेत्रों पर नियंत्रण का अधिकार है? क्या स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना भू-राजनीतिक निर्णय लेने उचित हैं।

-महेशचंद्र शर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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