पावर सिस्टम विस्तार और राजस्थान में अक्षय ऊर्जा
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
राजस्थान में पावर सिस्टम विस्तार और अक्षय ऊर्जा आधुनिक ऊर्जा उद्योग में एक महत्वपूर्ण विषय है।
राजस्थान में पावर सिस्टम विस्तार और अक्षय ऊर्जा आधुनिक ऊर्जा उद्योग में एक महत्वपूर्ण विषय है। बढ़ती ऊर्जा मांग, पर्यावरणीय चिंताओं और ऊर्जा के स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता ने पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से हटकर अक्षय ऊर्जा संसाधनों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। पावर सिस्टम का विस्तार और उसमें अक्षय ऊर्जा को शामिल करना ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता और दक्षता लाने में सहायक होता है।
वैश्विक ऊर्जा संकट को हल :
अपरंपरागत ऊर्जा या नवीकरणीय ऊर्जा ऐसे ऊर्जा स्रोतों को संदर्भित करती है, जो पुन: उत्पन्न हो सकते हैं और पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं। इसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस, जल विद्युत और जैव ऊर्जा शामिल हैं। इन स्रोतों का उपयोग वैश्विक ऊर्जा संकट को हल करने और पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने में सहायक है। राजस्थान को सूर्य भूमि कहा जाता है, क्योंकि यह 300 से अधिक धूप वाले दिन प्रति वर्ष प्राप्त करता है। राज्य में लगभग 142 जीडब्ल्यू सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता है। राजस्थान 2023 तक सौर ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी राज्य बन गया है, जिसमें लगभग 21.4 जीडब्ल्यू की उत्पादन क्षमता स्थापित हो चुकी है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव :
जनसंख्या वृद्धि के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसे पूरा करने के लिए पावर सिस्टम का विस्तार जरूरी है। भारत में ऊर्जा मांग हर साल लगभग 5% की दर से बढ़ रही है। कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के लिए पवन, सौर, जल और बायोमास जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है। राज्य के पश्चिमी क्षेत्र जैसे जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर में पवन ऊर्जा की बड़ी संभावनाएं हैं। राज्य के कृषि-प्रधान क्षेत्र बायोमास ऊर्जा के लिए उपयुक्त हैं। राज्य में बायोमास ऊर्जा की संभावित क्षमता लगभग 1700 मेगावाट है व राज्य में कुछ छोटे जल विद्युत परियोजनाएं हैं, जिनकी क्षमता 59 मेगावाट तक है।
अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा :
राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ-साथ अक्षय ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यधिक संभावनाओं वाला क्षेत्र भी है। यहां की भौगोलिक स्थिति, विस्तृत रेगिस्तानी क्षेत्र और प्रचुर धूप इसे सौर ऊर्जा के लिए आदर्श बनाते हैं। साथ ही, पवन ऊर्जा और बायोमास जैसे स्रोतों के उपयोग से राजस्थान न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि अन्य राज्यों को भी बिजली आपूर्ति कर रहा है। पावर सिस्टम विस्तार और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना राज्य की आर्थिक और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए बेहद आवश्यक है। राज्य में शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और कृषि क्षेत्र के विस्तार से बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है। इसके साथ में राज्य के समस्त शहरों में ऊर्जा की खपत लगातार बढ़ रही है।
हरित हाइड्रोजन संयंत्र की घोषणा :
राज्य में अक्षय ऊर्जा के तहत सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए पर्याप्त धूप और विशाल भूमि क्षेत्र उपलब्ध हैं, जिसमें भादला सोलर पार्क एशिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क है, इसकी क्षमता लगभग 2.25 गीगावॉट है। राजस्थान के कई क्षेत्रों में पवन ऊर्जा उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं, जिसके तहत जैसलमेर और बाड़मेर में कई पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए गए हैं। कृषि अपशिष्ट और अन्य जैविक कचरे से ऊर्जा उत्पादन के तहत कोटा और अलवर में बायोमास संयंत्र लगाए गए हैं। तापमान में वृद्धि और मौसम में अनियमितता उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। राजस्थान में नई प्रस्तावनाएं के तहत सौर और पवन ऊर्जा का संयुक्त उत्पादन (हाइब्रिड सिस्टम) विकसित करने की योजना में बीकानेर और जैसलमेर में हाइब्रिड ऊर्जा प्लांट्स की स्थापना, बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने का निर्णय लिया है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक कुशल बनाया जा सके।
सिस्टम के विस्तार में कई चुनौतियां :
पावर सिस्टम के विस्तार में कई चुनौतियां हैं। राज्य का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी है, जिससे ग्रिड का विस्तार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं और पावर ग्रिड विस्तार के लिए बड़े वित्तीय निवेश की आवश्यकता है। ग्रिड स्थिरता बनाए रखना और विभिन्न ऊर्जा स्रोतों को एकीकृत करने में तकनीकी समस्या अभी भी है। पावर प्लांट्स और ग्रिड विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण के कारण पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याएं भी होती हैं। ऊर्जा की आपूर्ति और मांग को संतुलित करने के लिए स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकी का विकास करना व स्मार्ट मीटर और वितरण नेटवर्क का उन्नयन करना हैं। बड़े सौर ऊर्जा पाकोंर् के निर्माण को बढ़ावा देना होगा। पाली और बीकानेर जिलों में नए सोलर पार्क प्रस्तावित हैं व ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो-ग्रिड और सामुदायिक ऊर्जा परियोजनाओं का विकास करना होगा।
50 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य :
भविष्य की योजनाओं के तहत राजस्थान ने 2030 तक 50 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है व यहां से भारत के अन्य राज्यों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों को अक्षय ऊर्जा निर्यात करने की योजना बना रहा है। जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर जिलों में नई सौर ऊर्जा परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं व साथ ही हरित हाइड्रोजन उत्पादन की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। पावर सिस्टम विस्तार और अक्षय ऊर्जा का समावेश न केवल ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक है, बल्कि यह पर्यावरणीय स्थिरता, आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित करता है। अक्षय ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करके हम टिकाऊ विकास के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।
- डॉ. रिपुन्जय सिंह
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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