अदम्य बल, अटूट भक्ति हनुमान जन्मोत्सव का संदेश

सेवा भाव और लोकमंगल 

अदम्य बल, अटूट भक्ति हनुमान जन्मोत्सव का संदेश

राम के अनन्य भक्त हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, साहस, निष्ठा, विनम्रता और समर्पण का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

राम के अनन्य भक्त हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, साहस, निष्ठा, विनम्रता और समर्पण का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। इस पावन व पवित्र दिन मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना, भजन कीर्तन, हनुमान चालीसा तथा सुंदरकांड का पाठ किया जाता है। हनुमान भक्त व्रत रखते हैं और बालाजी महाराज को चूरमा, लड्डू, पेड़ा, नारियल, लाल ध्वज व सिंदूर अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इस दिन उनकी उपासना से भय, संकट, रोग,भूत प्रेत बाधा और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी अंजनी पुत्र, केसरीनंदन और पवनपुत्र कहलाते हैं, कलियुग के देवता तथा चिरंजीवी माने जाते हैं। उनका जन्म त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को आंजन नामक पर्वतीय क्षेत्र में हुआ माना जाता है। जन्म के बाद वायुदेव ने उनका नाम मारुति रखा था, किंतु भगवान इंद्र के वज्र प्रहार से ठुड्डी, हनु पर आघात होने के कारण वे हनुमान कहलाए। उन्हें शिव का ग्यारहवां अवतार माना जाता है और देवताओं के वरदान से वे अजेय, निरोग और अमर माने गए हैं।

नव निधियों के दाता :

हनुमान जी असीम बल,तीक्ष्ण बुद्धि और परम भक्ति के अद्वितीय संगम हैं। श्रीरामचरितमानस सुंदरकांड में कहा गया है कि वे अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व सहित अष्ट सिद्धियों के स्वामी तथा पद्म,महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व नामक नव निधियों के दाता कहे जाते हैं और इसीलिए उन्हें कहा गया है अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, उनके बल का अलंकारिक वर्णन यह है कि 10 हजार हाथियों का बल एक ऐरावत हाथी में, 10 हजार ऐरावतों का बल एक इन्द्र में और 10 हजार इन्द्रों, का बल हनुमान जी के एक रोम में निहित है। वे इच्छानुसार सूक्ष्म से विशाल रूप धारण कर सकते हैं, लंका में प्रवेश करते समय उन्होंने मच्छर समान रूप लिया, सुरसा के सम्मुख महाविशाल हो गए और परिस्थिति के अनुसार अपने आकार का परिवर्तन किया। बाल्यकाल में उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया, उसी समय राहु भी सूर्य को ग्रसने आया था, जिससे सूर्यदेव ने उन्हें दूसरा राहु समझ लिया,यह प्रसंग उनकी अपार शक्ति के साथ साथ जिज्ञासा और साहस का भी प्रतीक है।

नीतिज्ञ और कुशल कूटनीतिज्ञ :

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इतना ही नहीं, वानर सेना के साथ मिलकर उन्होंने लगभग 52 किमी लंबा और 3 किमी चौड़ा रामसेतु निर्माण कराने में सहयोग दिया। लंका में प्रवेश करते समय उनका सूक्ष्म रूप, विभीषण से ब्राह्मण वेश में मिलना और सीता माता से छोटे वानर रूप में संवाद उनकी नीति, विवेक और परिस्थिति बोध को दर्शाता है। सुरसा ने उनकी बुद्धि और बल से प्रसन्न होकर रामकाज सफल होगा का आशीर्वाद दिया। पाठकों को बताता चलूं कि हनुमान जी केवल बलवान ही नहीं, अत्यंत बुद्धिमान, नीतिज्ञ और कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे। ब्राह्मण वेश में श्रीराम से मिलकर पहले उनकी पहचान करना और फिर उचित समय पर सुग्रीव की बात रखना उनकी राजनीतिक समझ का परिचायक है। उन्होंने राम सुग्रीव की मित्रता अग्नि को साक्षी मानकर कराई, जो निष्कपट विश्वास का प्रतीक है। जामवंत, ब्रह्मा के मानस पुत्र के द्वारा उनकी शक्ति का स्मरण कराए जाने पर उन्होंने अहंकार नहीं किया, बल्कि भगवान् श्रीराम की कृपा को आधार मानकर समुद्र पार किया,यह उनकी विनम्रता और समर्पण को दर्शाता है। उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी अटूट भक्ति है, वे सर्वशक्तिमान होकर भी स्वयं को राम का सेवक मानते हैं और शक्ति और ज्ञान का अहंकार नहीं करते।

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सभी मनोकामनाओं की पूर्ति :

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एक प्रसंग में उन्होंने अपना वक्षस्थल चीरकर दिखाया कि उसमें श्रीराम और जानकी जी विराजमान हैं, जिससे उनकी अनन्य भक्ति सिद्ध होती है। महाभारत काल में उन्होंने भीम का अहंकार तोड़ने के लिए वृद्ध वानर का रूप धारण किया,जहां भीम उनकी पूंछ तक नहीं हिला सके थे। वे पंचमुखी रूप वराह, नरसिंह, गरुड़, हयग्रीव और हनुमान में भी पूजित हैं। उनके गुरु सूर्यदेव हैं, जिनसे उन्होंने अल्प समय में समस्त ज्ञान और नौ दिव्य विद्याएं प्राप्त कीं। उनकी गदा वामहस्त कही जाती है, जिसे कुबेर द्वारा प्रदत्त और अद्वितीय शक्ति से युक्त माना गया है। उन्हें सिंदूर व भोग में चूरमा अत्यंत प्रिय है। विवरण मिलता है कि राम की आयु वृद्धि वाले कथन से प्रेरित होकर उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर पोत लिया था। उनके बारह नाम हनुमान, अंजनीसुनू, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुन सखा, पिंगाक्ष, अमित विक्रम, उदधिक्रमण, सीता शोक विनाशन, लक्ष्मण प्राणदाता और दशग्रीव दर्पहा का जप करने से समस्त प्रकार की सुख समृद्धि, आरोग्य और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

सेवा भाव और लोकमंगल :

श्रीमद्गगोस्वामी तुलसीदास जी विरचित श्रीरामचरितमानस सुंदरकांड में क्या खूब कहा गया है कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं। इसका मतलब यह है कि हे हनुमान जी! इस संसार में ऐसा कौन सा कार्य है जो कठिन हो और आपके द्वारा पूरा न किया जा सके। अंततः, यही कहूंगा कि हनुमान जी का जीवन त्याग, सेवा, धैर्य, उत्साह, परोपकार, संयम और अहंकार रहित समर्पण का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है। हनुमान जी के बारे में सुंदरकांड में कहा गया है और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई। कि जो व्यक्ति अपने मन को इधर उधर भटकाने के बजाय अन्य देवताओं में नहीं उलझाता और केवल हनुमान जी की भक्ति करता है, उसे सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। हनुमान जी सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें स्वयं को भूलकर दूसरों के कल्याण में लगना हो। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना, इसका मतलब यह है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी की शरण में जाता है, उसे सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।आज के समय में, जब मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख होता जा रहा है, हनुमान जी का चरित्र हमें सही दिशा देता है विनम्र रहकर, सेवा भाव से और लोकमंगल के लिए कार्य करते हुए जीवन को सार्थक बनाना ही सच्ची भक्ति है।

-सुनील कुमार महला
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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