विश्व हिन्दी पत्रिका ने कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी को बताया पत्रकारिता का मौन नायक, कहा- जिनके लिए पत्रकारिता सत्ता नहीं, समाज, लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की सांस थी
कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी ऐसे ही अध्याय का नाम
विश्व हिन्दी पत्रिका 2025 का शोध आलेख 'अद्भुत हिन्दी सेवी : कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी' उस विरासत को दर्ज करता है, जिसमें भाषा जन-संपर्क नहीं; जन-प्रतिरोध की जमीन बनती है। शोध लेख भाषा और साहित्यविद सुरेश कुमार श्रीचंदानी ने लिखा। हिन्दी की यात्रा अक्सर आंदोलनों, संस्थानों और घोषणाओं से लिखी जाती।
अजमेर। 'विश्व हिन्दी पत्रिका 2025' का शोध आलेख 'अद्भुत हिन्दी सेवी : कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी' उस विरासत को दर्ज करता है, जिसमें भाषा जन-संपर्क नहीं; जन-प्रतिरोध की जमीन बनती है। शोध लेख भाषा और साहित्यविद सुरेश कुमार श्रीचंदानी ने लिखा है। हिन्दी की यात्रा अक्सर आंदोलनों, संस्थानों और घोषणाओं से लिखी जाती है; लेकिन उसके सबसे स्थाई अध्याय वे हैं, जिन्हें किसी एक व्यक्ति की नैतिक जिद, सार्वजनिक सेवा और रोजमर्रा की पत्रकारिता ने रचा। कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी ऐसे ही अध्याय का नाम हैं—एक स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने भाषा को सत्ता का औजार नहीं, समाज की सांस बनाया। विश्व हिन्दी पत्रिका के 2025 अंक में प्रकाशित, पृष्ठ 148 का शोध आलेख—'अद्भुुत हिन्दी सेवी—कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी'—इसी मौन, लेकिन निर्णायक विरासत का सघन अवलोकन प्रस्तुत करता है। यह आलेख केवल एक जीवनी नहीं, हिन्दी पत्रकारिता के उस नैतिक ढांचे का दस्तावेज है, जिसमें भाषा जन-संपर्क का साधन नहीं, जन-प्रतिरोध की जमीन बनती है। चौधरी का जीवन—स्वाधीनता संग्राम की जोखिमों से लेकर अखबार की रोज की समय-सीमा तक—यह दिखाता है कि विचारों की विश्वसनीयता कैसे संस्थानों से पहले व्यक्तित्वों में जन्म लेती है। लेख बताता है कि कैसे चौधरी ने अखबार को सत्ता-समीकरणों से ऊपर रखा, कैसे भाषा की शुद्धता उनके लिए सौंदर्य नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी थी।
राजस्थान की धरती पर हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआती संरचनाएं बनाते समय चौधरी ने जो रास्ता चुना, वह सुविधाजनक नहीं था। आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रलोभन और वैचारिक ध्रुवीकरण—इन सबके बीच उनकी पत्रकारिता का केंद्र एक ही रहा: नागरिक। यही कारण है कि दैनिक नवज्योति की स्थापना और संपादन को लेख, महज एक संस्थागत उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अनुशासन का अभ्यास मानता है। चौधरी के लिए समाचार 'खबर' से पहले 'जिम्मेदारी' था—और हिन्दी, उस जिम्मेदारी की भाषा। शोध आलेख की शक्ति उसके विवरण में नहीं, उसके निष्कर्ष में है। यह हमें याद दिलाता है कि भाषा-सेवा किसी एक मंच की नहीं होती, वह स्कूलों, अखबारों, आंदोलनों और रोजमर्रा की नैतिकताओं में पनपती है। चौधरी की भूमिका इसी सतत परिश्रम की मिसाल है—जहां सम्पादन, लेखन और संगठन, तीनों एक ही नैतिक सूत्र से बंधे रहे। मॉरिशस स्थित विश्व हिन्दी पत्रिका का यह अंक, और उसकी प्रधान संपादक डॉ. माधुरी रामधारी का सम्पादकीय दृष्टिकोण, हिन्दी को सीमाओं से मुक्त एक वैश्विक सार्वजनिक विमर्श के रूप में देखता है। इसी वैश्विकता में चौधरी की स्थानीयता चमकती है—यह याद दिलाते हुए कि भाषा की सबसे बड़ी ताकत उसकी जड़ें होती हैं। आज, जब पत्रकारिता की गति सत्य से तेज हो चली है, यह आलेख एक विराम की तरह पढ़ा जाना चाहिए। यह पूछता है: क्या हम भाषा को अभी भी नागरिकता की भाषा मानते हैं? कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी का जीवन—और यह शोध—उत्तर देता है: हां, यदि पत्रकारिता अपने मूल वचन पर लौट आए।
कौन हैं श्रीचंदानी?
सुरेश कुमार श्रीचंदानी (अजमेर) सेवानिवृत्त हिन्दी अनुवादक, लेखक, संपादक और अनुवाद-विशेषज्ञ हैं। उन्होंने भारतीय दूरसंचार विभाग-बीएसएनएल तथा दी ओरिएण्टल इंश्योरेंस में लगभग चार दशक तक राजभाषा-कार्यान्वयन, अनुवाद, मंच-संचालन और सांस्कृतिक गतिविधियों का नेतृत्व किया।

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