साठ दिन में मुकदमा तय नहीं होने के आधार पर स्वत: जमानत पाने का अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
ऐसे मामलों को तय अवधि में तय करने का प्रयास करें
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 480(6) के तहत सिर्फ 60 दिन में ट्रायल पूरा न होने से गैर-जमानती मामले में आरोपी को स्वतः जमानत नहीं मिल सकती। जस्टिस चन्द्र प्रकाश श्रीमाली ने 82 लाख की ठगी के आरोपी अजीत कुमार शुक्ला की जमानत याचिका खारिज करते हुए न्यायिक अधिकारियों को मामलों का समयबद्ध निस्तारण करने के निर्देश दिए।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि किसी आरोपी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480 की उपधारा 6 के तहत जमानत का स्वत: लाभ इस आधार पर नहीं मिल सकता कि गैर जमानती मामले में साक्ष्य दर्ज करने के प्रथम दिन से साठ दिन में प्रकरण तय नहीं हुआ है। इसके साथ ही अदालत ने मामले में दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस चन्द्र प्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने यह आदेश अजीत कुमार शुक्ला की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। साथ ही अदालत ने मामले में प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को कहा है कि वह ऐसे मामलों को तय अवधि में तय करने का प्रयास करें।
जमानत याचिका में कहा गया कि उसके खिलाफ श्याम नगर थाना पुलिस में साल 2024 में एफआईआर दर्ज हुई थी और वह गत 25 मई से न्यायिक अभिरक्षा में है। याचिका में कहा गया कि गत 18 अगस्त को निचली अदालत उसके खिलाफ आरोप तय कर चुकी है। इसके बावजूद किसी भी गवाह के बयान दर्ज नहीं कराए गए, जबकि बीएनएसएस की धारा 480 की उपधारा 6 के तहत यदि गैर जमानती मामले में आरोप तय होने के साठ दिन में सुनवाई पूरी नहीं होती तो आरोपी को जमानत का लाभ दिया जा सकता है। इसलिए उसे जमानत पर रिहा किया जाए। जिसका विरोध करते हुए सरकारी वकील एमएस शेखावत ने कहा कि उसने पीडित को प्रॉफिट ट्रेडिंग प्लान का लालच देकर उससे करीब 82 लाख रुपए की ठगी की है। धारा 480 की उपधारा 6 को अनिवार्य प्रावधान नहीं माना जा सकता और अदालत परिस्थितियों को देखते हुए जमानत पर निर्णय कर सकती है। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने जमानत याचिका को खारिज करते हुए प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं।

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