झुंझुनूं के ‘रीढ़ का टीला’ में मिला हजारों साल पुराने मानव बसावट का प्रमाण : पुरातात्विक उत्खनन में प्रागैतिहासिक औज़ार, मंदिर स्थापत्य और 11वीं-12वीं शताब्दी की मूर्तियों के मिले अवशेष
आगे और मिल सकते हैं महत्वपूर्ण साक्ष्य
झुंझुनूं के ग्राम त्योंदा के पास ‘रीढ़ का टीला’ पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हो रहा। राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन में 11वीं-12वीं शताब्दी की मूर्तियां, मंदिर अवशेष, टेराकोटा और धातु के उपकरण, मृद्भांड और प्रागैतिहासिक पत्थर के औजार। विशेषज्ञ इसे प्राचीन धार्मिक और औजार निर्माण केंद्र मानते।
जयपुर। झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील के ग्राम त्योंदा के पास स्थित ‘रीढ़ का टीला’ इन दिनों पुरातात्विक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। राजस्थान राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा यहां वैज्ञानिक पद्धति से उत्खनन कार्य किया जा रहा है, जिसमें कई महत्वपूर्ण पुरावशेष सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थल प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक मध्यकाल तक मानव गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र रहा होगा।
प्राचीन मंदिर और मूर्तिकला के मिले साक्ष्य :
उत्खनन के दौरान पत्थर की मूर्तियों के कई खंड प्राप्त हुए हैं। इनमें विशेष रूप से देवी Lakshmi और Ganesha की खंडित प्रतिमाओं के अवशेष शामिल हैं। मूर्तियों की शैली और शिल्पकला के आधार पर विशेषज्ञ इन्हें 11वीं–12वीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं। इसके अलावा नक्काशीदार पत्थर के स्तंभ, द्वार चौखट के हिस्से, अलंकरणयुक्त पत्थर के ब्लॉक और आधार पत्थर जैसे कई स्थापत्य अवशेष भी मिले हैं। इन अवशेषों से संकेत मिलता है कि यहां कभी एक भव्य मंदिर परिसर या धार्मिक केंद्र मौजूद रहा होगा।
टेराकोटा और धातु अवशेष भी मिले :
खुदाई के दौरान टेराकोटा वस्तुएं, लघु आकृतियों के खंड और सजावटी सामग्री भी प्राप्त हुई हैं, जो उस समय के लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक देती हैं। इसके साथ ही लौह धातु की कीलें, क्लैम्प, औजारों के टुकड़े और ताम्र धातु के छोटे अवशेष भी मिले हैं। ये वस्तुएं उस काल की तकनीकी दक्षता और निर्माण कार्यों के प्रमाण मानी जा रही हैं।
मृद्भांडों से मिली घरेलू जीवन की झलक :
उत्खनन में बड़ी मात्रा में लाल मृद्भांड के टुकड़े भी मिले हैं, जो चाक पर बनाए गए प्रतीत होते हैं। इनमें घड़े, कटोरे, हांडी और भंडारण पात्रों के अवशेष शामिल हैं। कुछ मृद्भांडों पर काले रंग से ज्यामितीय आकृतियां भी बनी हुई हैं, जबकि कई पर जले हुए निशान पाए गए हैं। इससे उस समय की भोजन पकाने और भंडारण से जुड़ी परंपराओं का संकेत मिलता है।
प्रागैतिहासिक औजार निर्माण का केंद्र रहा क्षेत्र :
सर्वेक्षण के दौरान टीले के आसपास पहाड़ी ढलानों और कंकरीली सतहों पर बड़ी संख्या में प्रागैतिहासिक पत्थर के औजार, कोर और फ्लेक भी मिले हैं। ये औजार मुख्यतः क्वार्ट्जाइट जैसे कठोर पत्थरों से बने प्रतीत होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल में पत्थर के औजार बनाने का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा, जहां प्राचीन मानव समूह स्थानीय पत्थरों से औजार तैयार करते थे।
आगे और मिल सकते हैं महत्वपूर्ण साक्ष्य :
पुरातत्वविदों के अनुसार अरावली पर्वतमाला के निकट स्थित यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और पत्थर के कच्चे पदार्थ की उपलब्धता के कारण प्राचीन मानव के लिए अनुकूल रहा होगा। विभाग द्वारा यहां आगे भी विस्तृत सर्वेक्षण और वैज्ञानिक उत्खनन जारी रखने की योजना है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि आने वाले समय में यहां से और भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य मिल सकते हैं, जो शेखावाटी क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विकास को समझने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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