राजस्थान में खेल संघों की बदलती तस्वीर : अब आर्थिक सहयोग नहीं, 'सुरक्षा कवच' प्राथमिकता

प्रवृत्ति केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं

राजस्थान में खेल संघों की बदलती तस्वीर : अब आर्थिक सहयोग नहीं, 'सुरक्षा कवच' प्राथमिकता

राजस्थान में खेल संघों की कार्यशैली और प्राथमिकताओं में बीते कुछ वर्षों में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला। एक समय था जब अधिकांश खेल संघ आर्थिक तंगी से जूझते थे और सीमित संसाधनों में राज्य व जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन करना उनके लिए बड़ी चुनौती।

जयपुर। राजस्थान में खेल संघों की कार्यशैली और प्राथमिकताओं में बीते कुछ वर्षों में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। एक समय था जब अधिकांश खेल संघ आर्थिक तंगी से जूझते थे और सीमित संसाधनों में राज्य व जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन करना उनके लिए बड़ी चुनौती होता था। उस दौर में संघों की पहली प्राथमिकता आर्थिक सहयोग जुटाना होती थी। इसके लिए वे उद्योगपतियों, व्यवसाइयों और वरिष्ठ अधिकारियों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते थे। लेकिन अब परिदृश्य काफी बदल चुका है। खेल संघों के सामने आर्थिक संकट पहले जैसा गंभीर नहीं रहा। इसके उलट अब उनका फोकस प्रशासनिक और कानूनी सुरक्षा पर केंद्रित होता जा रहा है। राज्य में खेल कानून और खेल परिषद की बढ़ती दखलंदाजी के चलते कई संघ संभावित जांच, हस्तक्षेप और कार्रवाई से बचाव के उपाय तलाश रहे हैं। इसी बदले माहौल में राज्य और जिला स्तर के कई खेल संघ अपने संगठन में प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों को शामिल करने में रुचि दिखा रहे।

अलग-अलग नजरिया : कानून कुछ पदाधिकारी इस बदलाव को व्यावहारिक आवश्यकता मानते हैं। उनका तर्क है कि वर्तमान में नियमों और प्रक्रियाओं की जटिलता को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर मजबूत समर्थन जरूरी हो गया है, जिससे संों का संचालन सुचारू रूप से किया जा सके। वहीं दूसरी ओर कई जानकारों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती रही, तो खेलों के विकास की बजाय संघों का ध्यान शक्ति संतुलन और संरक्षण पर केंद्रित हो सकता है। इसका सीधा असर खिलाड़ियों और खेल गतिविधियों पर पड़ सकता है।

क्रिकेट पर सबसे अधिक प्रभाव : राजनीतिक हस्तक्षेप का सबसे अधिक प्रभाव क्रिकेट में देखने को मिल रहा है। प्रदेश के विभिन्न जिला क्रिकेट संघों में कई राजनेताओं या उनके परिजनों की सक्रिय भागीदारी बढ़ी है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. सीपी जोशी और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत राजसमन्द में, राज्य में मंत्री हेमन्त मीणा और प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता पिंकेश जैन प्रतापगढ़ में, उदयपुर के महाराणा अरविन्द सिंह के बेटे लक्ष्यराज सिंह उदयपुर में, भाजपा नेता रामपाल शर्मा भीलवाड़ा में, राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के बेटे धनंजय सिंह और राजनीतिज्ञ चन्द्रराज सिंघवी के पोते अरिष्ट सिंघवी जोधपुर में, भाजपा सांसद घनश्याम तिवाड़ी के बेटे आशीष तिवाड़ी सीकर में, विधायक जसवंत यादव के बेटे मोहित यादव अलवर में, विधायक संजीव बेनीवाल के बेटे अर्जुन बेनीवाल हनुमानगढ़ में, कांग्रेस नेता शिवचरण माली करौली, विवेक व्यास टोंक और डॉ. सुमित गर्ग सवाईमाधोपुर में, भाजपा विधायक जयदीप बिहाणी गंगानगर में, पूर्व मंत्री राजेन्द्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह चूरू जिला क्रिकेट संघ में पदाधिकारी बने हैं। 

अन्य खेल भी अछूते नहीं : याह प्रवृत्ति केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं है। अन्य खेलों के संघों में भी राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े पदाधिकारियों की भागीदारी बढ़ी है। केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत बैडमिंटन, पूर्व विधायक राजकुमार जयपाल हॉकी, पूर्व विधायक मानवेन्द्र सिंह जसोल फुटबाल, राज्य में मंत्री जवार सिंह बेडम तीरन्दाजी, जनार्दन सिंह गहलोत के बेटे तेजस्वी सिंह कबड्डी, भंवर सिंह पलाड़ा खो-खो, क्रीडा भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल सैनी एथलेटिक्स और क्रीडा भारती के राष्ट्रीय महामंत्री रामानन्द चौधरी वालीबाल संघ में पदाधिकारी बने हैं।

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