महिला दिवस पर विशेष : भारतीय महिलाओं के बारे में 12 सबसे चौंकाने वाले तथ्य, जानें क्या हैं वह तथ्य
पलब्धियों और चुनौतियों दोनों की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय महिलाओं की तस्वीर प्रेरणादायक भी है और चुनौतीपूर्ण भी। शिक्षा में महिलाएँ पुरुषों से आगे हैं, पंचायतों में 46% प्रतिनिधित्व है और 79% के पास बैंक खाते। फिर भी श्रमबल भागीदारी कम, 57% एनीमिया, 23% बाल-विवाह, डिजिटल गैप और संपत्ति पर सीमित अधिकार जैसे मुद्दे आज भी महिलाओं की प्रगति के सामने बड़ी बाधाएँ।
जयपुर। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भारतीय महिलाओं की वास्तविक स्थिति को समझने का अवसर भी है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, राजनीति और डिजिटल पहुंच जैसे क्षेत्रों में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन कई गंभीर चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं। कुछ आँकड़े प्रेरित करते हैं, तो कुछ चौंकाते भी हैं। आइए जानते हैं भारतीय महिलाओं से जुड़े ऐसे 12 तथ्य, जो उनकी उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं।
1. भारत में 15 वर्ष से ऊपर की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी 41.7% तक पहुँची है, जो पिछले वर्षों की तुलना में बड़ा उछाल है। चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बढ़त के बाद भी यह संख्या पुरुषों के 78.8% से बहुत नीचे है।
2. उच्च शिक्षा में महिलाएँ अब पुरुषों के बराबर ही नहीं, थोड़ा आगे हैं। एआईएसएचई 2021-22 के अनुसार जेंडर पैरिटी इंडेक्स 1.01 रहा, यानी उच्च शिक्षा में महिला भागीदारी पुरुषों से थोड़ा अधिक थी। यह भारत की उन कहानियों में से है जहाँ शिक्षा ने सामाजिक धारणाओं को पीछे छोड़ा है।
3. पढ़ाई में आगे होने के बावजूद नौकरी में महिलाएँ बहुत पीछे हैं। यही भारतीय विरोधाभास है: कॉलेजों में बढ़ती मौजूदगी, मगर श्रम बाजार में सीमित अवसर, सुरक्षा-संकट, देखभाल-भार और सामाजिक अपेक्षाएँ उन्हें रोकती रहती हैं। पीएलएफएस और सरकारी विश्लेषण दोनों इस अंतर की पुष्टि करते हैं।
4. भारत में 15-49 वर्ष की लगभग 57% महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं। यानी हर दो में से एक से अधिक। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, पोषण, आय, देखभाल, गर्भावस्था और सामाजिक प्राथमिकताओं का संयुक्त संकेतक है।
5. 20-24 वर्ष की लगभग 23.3% भारतीय महिलाएँ 18 वर्ष से पहले ही विवाह कर चुकी थीं (एनएफएचएस -5, 2019-21)। कानून होने के बावजूद, लगभग हर चौथी युवती का बाल-विवाह के दायरे में आना बेहद गंभीर सामाजिक सच्चाई है।
6. भारतीय महिलाओं का बहुत बड़ा हिस्सा रोज का भारी अनपेड केयर वर्क करता है। टाइम यूज सर्वे के अनुसार महिलाएँ पुरुषों की तुलना में घरेलू और देखभाल संबंधी बिना वेतन वाले काम में कई गुना अधिक समय लगाती हैं। यही अदृश्य श्रम अक्सर उनकी नौकरी, आय और स्वतंत्रता को सीमित करता है।
7. करीब 79% महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है जिसे वे स्वयं इस्तेमाल करती हैं। यह बेहद बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि एनएफएचएस -4 से एनएफएचएस-5 के बीच इसमें तेज बढ़त हुई, लेकिन वित्तीय समावेशन बढ़ने के बावजूद आर्थिक निर्णय-शक्ति हर जगह समान रूप से नहीं बढ़ी।
8. मोबाइल फोन और डिजिटल पहुँच में लैंगिक अंतर अब भी बड़ा है। एनएफएचएस-5 के अनुसार केवल लगभग 54% महिलाओं के पास ऐसा मोबाइल फोन था, जिसे वे स्वयं इस्तेमाल करती थीं। डिजिटल भारत की कहानी में यह अंतर बहुत निर्णायक है, क्योंकि फोन ही आज बैंकिंग, शिक्षा, सुरक्षा और अवसर का दरवाजा है।
9. स्थानीय लोकतंत्र में भारतीय महिलाएँ दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचित महिला ताकतों में से एक हैं। केंद्र सरकार के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, जो कुल प्रतिनिधियों का लगभग 46% हैं। यह संख्या विस्मित करती है, क्योंकि संसद और विधानसभाओं में अब भी ऐसा अनुपात नहीं दिखता।
10. राष्ट्रीय संसद में महिलाएँ अब भी केवल 74 सांसद, यानी 13.6% हैं (18वीं लोकसभा)। गाँव की पंचायतों में लगभग आधी हिस्सेदारी और राष्ट्रीय संसद में इतना कम प्रतिनिधित्व—यह अंतर भारतीय लोकतंत्र का सबसे चौंकाने वाला जेंडर कॉन्ट्रास्ट है।
11. घरेलू हिंसा अब भी सच्चाई है। एनएफएचएस -5 के फेज-कक सारांश में 18-49 वर्ष की महिलाओं में 18.4% ने हिंसा का अनुभव बताया, और एनसीआरबी के 2023 अपराध आँकड़ों के अनुसार दर्ज अपराधों में सबसे बड़ा हिस्सा अब भी रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता का है।
12. संपत्ति पर महिलाओं का स्वामित्व अब भी बहुत सीमित है। एनएफएचएस -5 विश्लेषण के अनुसार केवल 13% महिलाएँ ही घर की मालिक हैं और 8.3% महिलाएँ भूमि की खुद मालिक हैं।

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