यह रेगिस्तान नहीं, मोहब्बत की ज़मीं है : गोवा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का जयपुर में आत्मीय स्वागत, संवाद में झलकी संस्कृति और सद्भाव की मिसाल
राजस्थान का खानपान और पहनावा बड़ा आकर्षक
गोवा विश्वविद्यालय के स्टडी टूर पर आए विद्यार्थियों ने जयपुर की आत्मीयता, हरियाली और संस्कृति की सराहना की। Divine Soul Foundation द्वारा आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकारों ने राजस्थान के इतिहास, लोकसंस्कृति, पर्यावरण प्रेम और गोवा-राजस्थान संबंधों पर विचार साझा।
जयपुर। राजस्थान के लोगों में आत्मीयता बहुत है। यहाँ के लोग मदद करने में बेहद उदार हैं। राजस्थान का खानपान और पहनावा बड़ा आकर्षक है। यहाँ आने से पहले राजस्थान को लेकर रेगिस्तान की जो छवि बनी हुई थी, वह यहाँ के पर्यावरण, हरियाली और पेड़-पौधों को देखकर पूरी तरह बदल गई।
यह प्रतिक्रिया थी गोवा विश्वविद्यालय से स्टडी टूर पर जयपुर आए छात्र-छात्राओं और उनके प्राध्यापकों की, जिनके लिए डिवाइन सोल फाउंडेशन ने जयपुर के साहित्यकारों के साथ एक आत्मीय संवाद का आयोजन किया। यह कार्यक्रम राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में आयोजित हुआ, जहाँ साहित्य और संस्कृति की एक जीवंत संगोष्ठी का वातावरण निर्मित हुआ।
कार्यक्रम में एम.ए. प्रथम वर्ष के 23 विद्यार्थियों के साथ प्रो. वृषाली मांद्रेकर, श्वेता गोवेकर और दीपक वरक उपस्थित थे। जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकारों—डॉ. हेतु भारद्वाज, हरिराम मीणा, प्रेमकृष्ण शर्मा, रत्नकुमार सांभरिया, चरणसिंह पथिक, प्रेमचंद गांधी, अशोक राही, राजीव आचार्य, लक्ष्मी शर्मा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और तसनीम खान—ने विद्यार्थियों के साथ मुक्त संवाद किया।
डॉ. हेतु भारद्वाज ने राजस्थान के सामंती राजाओं के कला और साहित्य के प्रति अनुराग तथा स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।वरिष्ठ आदिवासी चिंतक हरिराम मीणा ने राजस्थान के निर्माण में किसानों और आदिवासियों की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला।
वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमकृष्ण शर्मा ने गोवा के लोगों की आत्मीयता की प्रशंसा करते हुए कहा कि साहित्य का कार्य केवल समाज का मार्गदर्शन करना नहीं, बल्कि परस्पर सद्भाव और सकारात्मकता का विस्तार करना भी है।
लेखक चरणसिंह पथिक ने राजस्थान की लोक-संस्कृति और ग्राम्य जीवन की सादगी पर चर्चा की। उन्होंने पर्यावरण के प्रति राजस्थानियों के अथाह प्रेम का उदाहरण देते हुए खेजड़ी वृक्ष और खेजड़ली आंदोलन का उल्लेख किया।
साहित्यकार रत्नकुमार सांभरिया ने राजस्थान और गोवा के लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पुराने संबंधों की चर्चा करते हुए गोवा मुक्ति आंदोलन में राजस्थानियों के योगदान का उल्लेख किया। लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने गोवा और राजस्थान के दैनिक जीवन के संघर्षों की तुलनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।

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