दिव्यांगों के सपनों को परवाज देने के लिए विश्वविद्यालय खुला, लेकिन एक भी पद स्वीकृत नहीं
सरकार स्थापना कर के ही भूल गई
बाबा आमटे दिव्यांग विश्वविद्यालय को तीन साल से सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा। शैक्षणिक और अशैक्षणिक पद स्वीकृत नहीं हुए। कुलगुरु डॉ. देव स्वरूप ने यूजीसी मान्यता, वेबसाइट और विजन डाक्यूमेंट तैयार किए, लेकिन विश्वविद्यालय अभी भी सीमित कक्षों में सिमटा।
जयपुर। दिव्यांगों के सपनों को परवाज देने के लिए राज्य में बाबा आमटे दिव्यांग विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, लेकिन स्थापना के बाद से ही लगता है कि सरकार स्थापना कर के ही भूल गई। सरकार ने तीन साल से अधिक समय गुजरने के बाद भी एक भी शैक्षणिक और अशैक्षणिक पद स्वीकृत नहीं किया हैं। सरकार ने शिक्षाविद् डॉ.देव स्वरूप को कुलगुरु नियुक्त किया, कुलसचिव और वित्त नियंत्रक के पद भी भरे हुए हैं, लेकिन शैक्षणिक और अशैक्षणिक पद स्वीकृत तक नहीं हैं। विश्वविद्यालय की ओर से तीन दर्जन से अधिक बार शिक्षा का सैटअप तैयार करने के लिए पत्र लिखे गए, लेकिन फाइल पर जमी धूल तक नहीं हट सकीं। राज्य सरकार ने अप्रैल, 2023 में अधिनियम के तहत विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, लेकिन विश्वविद्यालय शिक्षा संकुल के श्लोका देवी अहिल्या बाई होल्कर भवन के चंद कमरों में ही सिमट कर रह गया हैं। विश्वविद्यालय के प्रति उपेक्षा का भाव है कि भूमि के लिए जामडोली में 20 एकड़ भूमि चिन्हित की गई, जबकि विश्वविद्यालय ने नियमों के तहत तीस एकड़ जमीन की मांग की थी, लेकिन अभी तक भूमि का शिलान्यास तक नहीं हो पाया है।
कुलगुरु ने यह किए प्रयास :
यूजीसी के अतिरिक्त सचिव एवं आरयू के पूर्व कुलगुरु डॉ.देव स्वरूप ने विश्वविद्यालय की वेबसाइट तैयार कराने के साथ ही भारतीय विश्वविद्यालय संघ, नई दिल्ली से विश्वविद्यालय को सदस्यता दिलवाई। यूजीसी से विश्वविद्यालय को मान्यता दिलवाने के साथ ही विश्वविद्यालय का विजन डाक्यूमेंट तैयार करवाया, लेकिन उपेक्षा का शिकार होने के कारण विश्वविद्यालय अपनी भूमिका को खोने लगा है।
क्या-क्या होता विश्वविद्यालय में ?
विश्वविद्यालय में करीब पचास प्रतिशत दिव्यांग और पचास प्रतिशत सामान्य विद्यार्थी अध्ययन करने का विजन डाक्यूमेंट तैयार किया था। दिव्यांग बच्चों के लिए अनेक तरह के पाठ्यक्रम तैयार किए, लेकिन कोई भी सपना साकार नहीं हो पाया।

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