हजारों टन वजनी घंटी का घुट रहा दम
सांचे से बाहर निकालने वाले नहीं मिल रहे विशेषज्ञ
कोटा। चम्बल नदी के किनारे बनाए गए विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल चम्बल रिवर फ्रंट एक ओर जहां देशी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। वहीं यहां लगने वाली हजारों टन वजनी विशाल घंटी तीन साल बाद भी सांचे से बाहर नहीं निकल सकी है। इसे सांचे से बाहर निकालने वाले विशेषज्ञ नहीं मिल पा रहे हैं।कांग्रेस सरकार के समय में तत्कालीन नगर विकास न्यास की ओर से 1442 करोड़ रुपए की लागत से चम्बल नदी के दोनों किनारों पर रिवर फ्रंट का निर्माण कराया गया था। दोनों तरफ करीब साढ़े पांच कि.मी. एरिया में बने इस रिवर फ्रंट का उद्घाटन तो सितम्बर 2023 में हो गया था। उसके बाद से यहां लाखों लोग सैर कर चुके हैं। यह देशी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
72 हजार किलो वजन है घंटी का
रिवर फ्रंट के दोनों छोर पर 26 अलग-अलग घाट बनाए गए हैं। जिनमें से पूर्वी छोर पर 12 और पश्चिमी छोर पर 14 घाट हैं। अधिकतर घाट का काम तो पूरा हो गया है। लेकिन पश्चिमी छोर पर शौर्य घाट के दांयी तरफ घंटी घाट बनाया गया है। जहां विश्व की सबसे वजनी घंटी लगानी है। इसके लिए यहां दीवार पर विशाल हुक तो लगा दिया। लेकिन उस पर अभी तक घंटी नहीं लग सकी है। उस समय करीब 72हजार किलो पीतल व अन्य धातु की विशाल घंटी को ढालने के लिए सांचे में तो डाल दिया था। लेकिन वह ठंडी होकर बाहर नहीं निकल सकी। इस घंटी का निर्माण करने वाले तत्कालीन इंजीनियर देवेन्द्र कुमार आर्य का घंटी को सांचे से बाहर निकालने के दौरान हादसे में निधन हो गया था। उसके बाद से अभी तक करीब पौने तीन साल का समय हो चुका है। घंटी अभी तक सांचे में ही ढकी हुई है। इस घंटी की ऊंचाई करीब 30 फीट व चौड़ाई 28 फीट है।
अभी तक परदे में ढकी है घंटी
तत्कालीन इंजीनियर देवेन्द्र आर्य ने उस समय करीब 35 भट्टियों में 72 हजार किलो पीतल व अन्य धातु को उच्च तापमान पर गलाया था। जिससे उस घंटी को सांचे में ढालकर आकार दिया जा सके। लेकिन आर्य का निधन होने के बाद से इसे बाहर निकालने के लिए अभी तक केडीए को कोई विशेषज्ञ नहीं मिल सके हैं। जिससे यह अभी तक भी परदे में ही ढकी हुई है।
दीवार पर हुक देखकर ही चला रहे काम
चम्बल रिवर फ्रंट पर रोजाना बड़ी संख्या में लोग घूमने आ रहे हैं। अन्य दिनों की तुलना में इन दिनों ग्रीष्म कालीन अवकाश चल रहे हैं। ऐसे में बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं। लेकिन पश्चिमी छोर पर घूमते समय घंटी घाट पर केवल दीवार पर हुक देखकर ही काम चला रहे हैं। लोगों को इस बारे में जानने की उत्सकुता भी रहती है। जिन्हें जानकारी है वे घंटी को हुक पर लटकी देखने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन लोगों का यह सपना कब पूरा होगा इसकी जानकारी अभी तक किसी को भी नहीं है।
हालांकि केडीए अधिकारी अपनी ओर से इस घंटी को सांचे से बाहर निकालने के लिए हर संभव प्रयास कर चुके हैं। विशेषज्ञों की तलाश तक की जा चुकी है। लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है।
इनका कहना है
केडीए की ओर से रिवर फ्रंट की घंटी को सांचे से बाहर निकालने के लिए विशेषज्ञों की तलाश की जा रही है। कुछ समय पहले नगरीय विकास विभाग की ओर से एमएनआईटी से मैटेलरी के प्रोफेसर से सम्पर्क करने के लिए कहा गया था। वहां सम्पर्क भी किया गया, लेकिन वहां इस तरह के कोई प्रोफेसर नहीं है। इस पर विभाग को अवगत भी करवा दिया गया है। लेकिन अभी तक आगे कोई प्रगति नहीं हुई है।
-बचनेश कुमार अग्रवाल, आयुक्त , कोटा विकास प्राधिकरण

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