121 साल पुराने पिंजरों में रखे जा रहे रेस्क्यू जंगली जानवर

सवाल: लेपर्ड रखने से पहले पिंजरे की जांच क्यों नहीं की गई

121 साल पुराने पिंजरों में रखे जा रहे रेस्क्यू जंगली जानवर
1905 में बना था रियासतकालीन चिड़ियाघर, तब के पिंजरों का हो रहा उपयोग।

कोटा। 121 साल पुराने रियासतकालीन चिड़ियाघर से पिंजरा तोड़ सैंकड़ों मॉर्निंग वाकर्स के बीच पहुंचा लेपर्ड ने वन्यजीव प्रबंधन की पोल खोलकर रख दी। घटना के एक घंटे बाद विभाग को जानकारी लगना अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है, चिड़ियाघर में रखे पिंजरे 1905 के बने हुए हैं, जो 100 साल से ज्यादा पुराने होने व जंग लगे होने से जगह-जगह से गल रहे हैं। जंगली वन्यजीवों को ऐसे पिंजरों में रखने से पहले अधिकारियों को इन संभावनाओं पर पिंजरे की जांच करनी चाहिए थी, जो घटना से स्पष्ट होता है कि न तो पिंजरे की मरम्मत करवाई गई और न ही कैज मजबूती परखी गई। हालांकि, सीसीएफ ने मामले की जांच शुरू करवा दी है। इधर, डीएफओ प्रमोद धाकड़ का कहना है कि इस पिंजरे में पिछले एक साल में करीब 8 से 10 रेस्क्यू लेपर्ड रख चुके हैं लेकिन इस तरह की घटना नहीं हुई।

वन्यजीव प्रेमियों ने उठाए सवाल
-चिड़ियाघर में मौजूद वन्यजीवों की देखरेख के लिए 6 से ज्यादा स्टाफ नियुक्त हैं, तो घटना का पता एक घंटे बाद क्योें लगा?
-बरसों पुराने पिंजरे वाइल्ड एनिमल को रखने लायक है या नहीं, इसकी जांच क्यों नहीं की गई?
-सीवी गार्डन में यदि कोई जनहानी हो जाती तो जवाबदेही किसकी होती।
-चिड़ियाघर में पिछले एक साल से 6 वर्षीय भालू रखा है, उसका पिंजरा नहीं टूटा तो इसका कैसे?

केयर टेकर को किया एपीओ
रियासतकालीन चिड़ियाघर से पिंजरा तोड़ सीवी गार्डन में पहुंची लेपर्ड के मामले में संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक डॉ. टी.मोहनराज ने केयर टेकर वसीम को एपीओ किया है।यह जानकारी डीएफओ प्रमोद कुमार धाकड़ ने दी।

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