गौशाला व बंधा गांव में हजारों पशु, फिर भी नहीं है चिकित्सालय की सुविधा

कम्पाउंडरों के भरोसे है निगम की गौशाला

गौशाला व बंधा गांव में हजारों पशु, फिर भी नहीं है चिकित्सालय की सुविधा
गौशाला में बीमारियों का बढ़ रहा प्रकोप

कोटा । शहर से कई किलोमीटर दूर बंधा गांव और वहां स्थित नगर निगम की गौशाला में जहां हजारों पशु हैं। वहां पशु चिकित्सालय की सुविधा तक नहीं है। निगम की गौशाला में इन दिनों बीमारियों का प्रकोप होने के बावजूद गौशाला कम्पाउंडरों के भरोसे है। बंधा धर्मपुरा में नगर निगम की गौशाला है।  जहां शहर से लावारिस हालत में पकड़े गए गौवंश को रखा गया है। वर्तमान में यहां करीब 3 हजार से अधिक मवेशी हैं। जिनमें सांड से लेकर गाय व बछड़े तक शामिल है। हालत यह है कि लावारिस हालत में पकड़े गए इन गौवंश में से अधिकतर बीमार  व कमजोर हालत में आते हैं। जिन्हें पशु चिकित्सक की देखभाल की आवश्यकता रहती है। गौशाला में बीमार व कमजोर गायों को अलग बाड़े में रखा हुआ है। हालांकि यहां पशु चिकित्सा केन्द्र तो बनाया हुआ है। लेकिन चिकित्सालय की सुविधा नहीं है। केन्द्र में मात्र कम्पाउंडर ही कार्यरत हैं। जिनके भरोसे पूरी गौशाला में गौवंश की देखभाल व उपचार किया जा रहा है। बंधा में ही गायत्री परिवार की गौशाला भी है। साथ ही गांव में अन्य पशु पालकों के भी पशु है। ऐसे में उन सभी को  पशुओं के बीमार होने पर उपचार के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

चक्कर खाकर गिरने का बढ़ रहा रोग
नगर निगम की गौशाला में पहले जहां लम्पी रोग से ग्रसित मवेशी सबसे पहले पाए गए थे। वहीं अब इनमें एक नई बीमारी चक्कर खाकर गिरने  वाली प्रोेयेजोमा बढ़ रही है। जिससे गौवंश की मृत्युदर में बढ़ोतरी हुई है। हालत यह है कि इस रोग के होने के बाद भी वहां न तो  पशु चिकित्सक की सुविधा है और न ही चिकित्सालय की। जिससे रोजाना मरने वाले गौवंश की संख्या सामान्य से अधिक हो गई है। 

सेवानिवृत्त उप निदेशक कार्यरत
नगर निगम की ओर से पशु चिकित्सालय से सेवानिवृत्त उप निदेशक डॉ. नंद किशोर वर्मा को नियुक्त किया हुआ है। लेकिन वे अधिकतर समय किशोरपुरा स्थित कायन हाउस में ही सेवाएं देते हैं। जबकि गौशाला में कम्पाउंडर ही कार्यरत हैं।  हालांकि बोराबास पशु चिकित्सा केन्द्र से सरकारी डॉक्टर गौशाला में आते हैं लेकिन वह कभी-कभी ही आते हैं।  

पशु चिकित्सालय व चिकित्सक हो
निगम की गौशाला में क्षमता से अधिक गौवंश है।  इसके अलावा वहां निजी गौशाला व गांव में अन्य पशु भी हैं। ऐसे में वहां पशु चिकित्सालय और पशु चिकित्सक का होना आवश्यक है। जिससे इतने अधिक गौवंश के बीमार होने पर उन्हें समय पर तुरंत उपचार मिल सके। हालांकि गौशाला में कम्पाउंडर हैं लेकिन वे अपना काम तो कर रहे हैं जबकि डॉक्टर का काम तो डॉक्टर ही कर सकता है। 
-डॉ. नंद किशोर वर्मा, रिटायर्ड उप निदेशक, पशु चिकित्सालय

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आयुक्त समेत अधिकारियों को कई बार कराया अवगत
 निगम की गौशाला में वर्तमान में करीब 3 हजार से अधिक गौवंश है। यह क्षमता से काफी अधिक है। ऐसे में यहां शहर से लावारिस हालत में लाए जा रहे गौवंश को घूमने की पर्याप्त जगह तक नहीं मिल पा रही है। ऐसे में वर्तमान में गौशाला में प्रोयेजोमा बीमारी का प्रकोप बढ़ा है। जिसमें पशु चक्कर खाकर गिरते हैं और वापस उठ नहीं पाते। जिससे उनकी मृत्युदर अधिक हुई है। इस बीमारी से रोजाना 5 से 6 गौवंश की मौत हो रही है। इस बीमारी के उपचार और गौशाला में पशु चिकित्सक की सुविधा करवाने के सबंध में निगम आयुक्त व अधिकारियों को कई बार अवगत कराया जा चुका है। लिखित में देने के बाद भी कोई व्यवस्था नहीं की गई। गौशाला में कम्पाउंडरों से काम चलाया जा रहा है। बोराबांस से पशु चिकित्सक कभी-कभी आकर गौशाला का निरीक्षण करते हैं। जबकि यहां नियमित पशु चिकित्सक होना चाहिए। 
-जितेद्र सिंह, अध्यक्ष गौशाला समिति, नगर निगम कोटा दक्षिण

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डॉक्टर की साप्ताहिक विजिट
गौशाला में स्थायी रूप से तो कम्पाउंडर लगाए हुए हैं। वे पूरे समय वहां सेवाएं दे रहे हैं। उनके अलावा किशोरपुरा कायन हाउस में सेवानिवृत्त डॉक्टर को भी लगाया हुआ है।साथ ही बोराबांस से सरकारी डॉक्टर सप्ताह में निगम की गौशाला का विजिट करते हैं। वर्तमान में जो बीमारी गौशाला में हुई है  उसकी दवाईयां व उपचार की व्यवस्था की जा रही है। 
-महेश गोयल, उपायुक्त व प्रभारी गौशाला नगर निगम कोटा दक्षिण

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