मांडवा में सफेद जहर का साम्राज्य : रिश्वत कांड ने खोला बड़ा नेटवर्क, आदिवासियों के भोलेपन का फायदा उठा तस्करों ने खरीदी जमीनें और बो डाली अफीम
संदिग्ध जमीन सौदों की भी जांच
फिल्मी कहानी या किसी वेब सीरीज का प्लॉट नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है, जहां तस्करों ने आदिवासियों की भोली-भाली जिंदगी का फायदा उठाकर उनकी जमीनें खरीदी और उन पर अवैध रूप से अफीम की खेती शुरू कर दी। प्रशासन की कार्रवाई के बाद अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलने लगी।
उदयपुर। जिले के दूरस्थ आदिवासी अंचल में बसे मांडवा गांव का नाम इन दिनों अचानक सुर्खियों में है। यह कोई फिल्मी कहानी या किसी वेब सीरीज का प्लॉट नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है, जहां तस्करों ने आदिवासियों की भोली-भाली जिंदगी का फायदा उठाकर उनकी जमीनें खरीदी और उन पर अवैध रूप से अफीम की खेती शुरू कर दी। प्रशासन की कार्रवाई के बाद अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलने लगी हैं। हाल ही में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरों की ओर से की गई कार्रवाई में डोडा-चूरा मामले में आरोपी नहीं बनाने की एवज में 8 लाख रुपए की रिश्वत लेते मांडवा थानाधिकारी निर्मल खत्री व कांस्टेबल भल्लाराम पटेल को गिरफ्तार किया था।
इसके साथ ही यह तो साफ हो गया कि डोडा-चूरा से पीड़ितों को मतलब नहीं था। उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि वे रिश्वत की इतनी बड़ी रकम दे सके। इसके पीछे अन्य कोई तंत्र काम कर रहा है। एसीबी की कार्रवाई में सामने आया रिश्वत कांड इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी बन गया है। सवाल यह उठ रहा है कि जिन गरीब ग्रामीणों के पास जीवनयापन के साधन सीमित हैं, वे इतनी बड़ी रिश्वत राशि कैसे दे सकते हैं? स्पष्ट है कि इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक नेटवर्क और संगठित गिरोह काम कर रहा है, जो न सिर्फ अवैध खेती करा रहा था, बल्कि सिस्टम में सेंध लगाकर खुद को बचाने की कोशिश भी कर रहा था।
गांव की चुप्पी में छिपी कहानी
मांडवा गांव तक पहुंचना आसान नहीं है। कच्चे रास्ते, पहाड़ी इलाका और सीमित संसाधन, यहां की जिंदगी पहले से ही संघर्षों से भरी है। गांव के अधिकांश लोग आदिवासी समुदाय से हैं, जो पारंपरिक खेती और मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यहां कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि कुछ बाहरी लोग गांव में आए। उन्होंने खुद को व्यापारी बताया और जमीन खरीदने के प्रस्ताव देने लगे। नकदी का लालच देकर उन्होंने कई आदिवासी परिवारों से जमीन के सौदे कर लिए। ज्यादातर लोगों को यह अंदाजा तक नहीं था कि उनकी जमीन का इस्तेमाल किस काम के लिए किया जाएगा।
खेतों में उगती सफेद फसल
जब प्रशासन को इस गतिविधि की भनक लगी तो एएनटीएफ एवं नारकोटिक्स विभाग की टीम ने संयुक्त कार्रवाई की। खेतों में जाकर देखा गया तो वहां अफीम की फसल लहलहा रही थी। यह खेती पूरी तरह अवैध थी और बड़े पैमाने पर की जा रही थी। कार्रवाई के दौरान कई बीघा जमीन पर लगी अफीम की फसल को नष्ट किया गया। चार दिनों तक ड्रोन के माध्यम से की गई कार्रवाई के दौरान करीब 484 करोड़ रुपए कीमत की अफीम की फसल नष्ट की गई थी। शुरूआती जांच में यह साफ हुआ है कि यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है।
नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी
जांच एजेंसियों का मानना है कि इस पूरे मामले के पीछे तस्करों का एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है, जो सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों को टारगेट करता है। यहां जमीन सस्ती मिलती है और लोगों को बहलाना आसान होता है। इसके अलावा दूरस्थ इलाकों में निगरानी भी कम होती है, जिसका फायदा उठाकर ऐसे अवैध काम आसानी से शुरू कर दिए जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक इस नेटवर्क के तार जिले से बाहर तक जुड़े हो सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है और संदिग्ध जमीन सौदों की भी जांच हो रही है।

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