भाई-बहन की भावनाओं का अटूट बंधन है रक्षाबंधन

रक्षाबंधन पर विशेष

भाई-बहन की भावनाओं का अटूट बंधन है रक्षाबंधन

हम उम्र भाई बहनों का आपस में लंबा साथ होता है। इसलिए उनमें भावनाओं की गहरी पैठ होती है। उनके इस भावनात्मक प्यार को और अटूट बनाता है राखी का त्यौहार यानी रक्षाबंधन। रक्षाबंधन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षाबंधन या राखी के दिन बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और इसके बदले में भाई अपनी बहन को सदैव रक्षा करने का वचन देता है।

 भाई बहन का आपस में प्यार करना, लड़ना, झगड़ना, खुशियों को साझा करना, परेशानियों से दोचार होना, ये तमाम ऐसी गतिविधियां होती हैं जो पहली बार एक लड़का, एक लड़की साथ साथ फेस करते हैं। इसलिए ये भावनाएं बहुत ही कोमल और दिल में बहुत गहरे तक समायी होती हैं। यही वजह होती है कि हम उम्र भाई बहन एक दूसरे को जितना समझते हैं, कई बार पति-पत्नी भी एक दूसरे को उतना नहीं समझ पाते। भावनाओं की गहरी पैठ हम उम्र भाई बहनों का आपस में लंबा साथ होता है। इसलिए उनमें भावनाओं की गहरी पैठ होती है। उनके इस भावनात्मक प्यार को और अटूट बनाता है राखी का त्यौहार यानी रक्षाबंधन। रक्षाबंधन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षाबंधन या राखी के दिन बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और इसके बदले में भाई अपनी बहन को सदैव रक्षा करने का वचन देता है। भारतीय परंपराओं में रचे बसे इस त्यौहार की जितनी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता है, उतनी ही धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता भी है। संवेदनाओं का पर्व रक्षाबंधन का पर्व भावनाओं और संवेदनाओं का पर्व है। इसकी परंपरा बहुत पुरानी है। भविष्य पुराण में इसके बारे में वर्णन मिलता है। इसके पीछे कहानी यह है कि दानवों और देवताओं के बीच युद्ध हो रहा था, इस युद्ध में देवताओं पर दानव भारी पड़ रहे थे, तब देवराज इंद्र घबराकर गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे और अपनी चिंता जतायी। जिस समय देवराज इंद्र गुरु बृहस्पति से यह सब चिंता साझा कर रहे थे, उनकी पत्नी इंद्राणी भी वहां मौजूद थीं। पति की सारी चिंता जानकर इंद्राणी ने रेशम का एक धागा लिया और उसे मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके पति इंद्र के हाथ में बांध दिया। यह श्रावण मास का दिन था। कहते हैं तभी से रक्षाबंधन का त्यौहार शुरू हुआ। रक्षाबंधन का जिक्र महाभारत में तो है ही साथ ही मध्यकालीन मुगलों से दौर से भी जुड़ा है। रक्षा का पारंपरिक भाव आज के युग में बहन की रक्षा करने का वह पारंपरिक भाव नहीं रहा, जो एक जमाने में होता था। लेकिन यह तो महज एक प्रतीक है। रक्षा करने का मतलब सिर्फ दुश्मन से रक्षा करना ही नहीं होता बल्कि तमाम तरह की परिस्थितियों में किसी का साथ देना भी उसकी रक्षा करना ही है। इसे एक ऐसे दायित्व और भावनात्मक बंधन के रूप में लिया जाना चाहिए, जिसके चलते इस युग में भी भाई-बहन का भावनात्मक रिश्ता सदैव मजबूत रहे।

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