पारिवारिक परंपरा को बोझ नहीं, समाधान समझें

जीने की संस्कृति 

पारिवारिक परंपरा को बोझ नहीं, समाधान समझें

समग्र विश्व एक वैश्विक ग्राम है और हम सभी इस बृहतपरिवार का हिस्सा हैं।

समग्र विश्व एक वैश्विक ग्राम है और हम सभी इस बृहतपरिवार का हिस्सा हैं। भारत ने तो वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष करते हुए समूची दुनिया को एक परिवार ही माना है। वैसे भारत की परिवार परम्परा दुनिया के लिये अनुकरणीय है। हम सभी एक परिवार हैं, चाहे हमारी नागरिकता, धर्म, जाति, सीमाएं या नस्ल कुछ भी हो। समग्र मानव जाति को एक साथ आना चाहिए और प्रेम और शान्ति में विश्वास करना चाहिए और विश्व में सुख और आशा लाने हेतु इसका अभ्यास करना चाहिए। संसार संघर्षों, युद्धों, उपद्रवों, कष्ट और पीड़ा से भरा पड़ा है। यदि हम सभी एक साथ आएं और दुनिया को प्रेम और धैर्य से ठीक करें, तो हम सभी खुशी से और अपने हृदयों में आशा के साथ रह सकते हैं। वैश्विक परिवार दिवस विविधता एवं एकता और विश्व शान्ति और अहिंसा महत्व के बारे में जागरूकता लाता है।

परिवार की भूमिका :

परिवार की भूमिका, उसकी बदलती संरचना और सामाजिक प्रासंगिकता आधुनिक समाज की सबसे गहरी विडंबनाओं और चुनौतियों को उजागर करने वाला एक चिंतन बन गया है। परिवार मानव जीवन की वह मूल इकाई है, जहां व्यक्ति का भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक निर्माण होता है। भारतीय संदर्भ में परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं रहा, बल्कि वह संस्कारों की पाठशाला, शांति, सहयोग एवं सौहार्द की प्रयोगभूमि और जीवन-मूल्यों का आधार रहा है। इसी परिवार-परंपरा ने भारत को सदियों तक सामाजिक स्थिरता, अहिंसा, सहिष्णुता और मानवीय करुणा का देश बनाए रखा। आज विडंबना यह है कि जिस भारतीय परिवार व्यवस्था को दुनिया एक आदर्श मॉडल के रूप में देख रही है, उसी भारत में वह धीरे-धीरे उपेक्षा और विस्मृति का शिकार होती जा रही है।

उपभोक्तावादी जीवनशैली :

Read More जानें राज काज में क्या है खास 

वैश्वीकरण, शहरीकरण, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने परिवार को सुविधा केंद्रित इकाई में बदल दिया है। संयुक्त परिवारों का विघटन, एकल परिवारों का बढ़ना और रिश्तों में औपचारिकता का प्रवेश इस परिवर्तन की स्पष्ट पहचान है। माता-पिता दोनों के कार्यरत होने की स्थिति में बच्चों के साथ समय बिताना एक चुनौती बन गया है। परिणामस्वरूप बचपन, जो कभी परिवार के स्रेह, संवाद और अनुभवों से संवरता था, आज स्क्रीन, अकेलेपन और भावनात्मक रिक्तता के बीच पनप रहा है। बच्चों के जीवन में माता-पिता की अनुपस्थिति केवल समय की कमी नहीं है, बल्कि वह सुरक्षा, संवाद और मार्गदर्शन की कमी भी है। परिवार का वह सहज वातावरण, जहां प्रश्न पूछे जा सकते थे, गलतियां स्वीकार की जा सकती थीं और भावनाएं साझा की जा सकती थीं, आज धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। बुजुर्ग, जो कभी परिवार की धुरी हुआ करते थे, अनुभव और संस्कार के संवाहक थे, आज कई घरों में हाशिये पर खड़े दिखाई देते हैं।

Read More भारत की अर्थव्यवस्था को 2025 ने दी नई रफ्तार : महंगाई काबू में, निवेश और शेयर बाजार ने बनाया नया रिकॉर्ड

वैश्विक स्तर पर :

Read More नए वर्ष में अनुत्तरित सवालों के जवाबों की तलाश

उनके पास समय नहीं, धैर्य नहीं और कभी-कभी सम्मान भी नहीं बचा। यह स्थिति केवल पीढ़ियों के बीच दूरी नहीं बढ़ा रही, बल्कि समाज को उसके नैतिक आधार से भी वंचित कर रही है। दूसरी ओर, यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि वैश्विक स्तर पर आज परिवार की भूमिका को नए सिरे से समझा जा रहा है। पश्चिमी देशों में, जहां अत्यधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता ने सामाजिक अकेलेपन को जन्म दिया, अब परिवार, साझेदारी और सामूहिक जीवन की पुनर्स्थापना पर गंभीर विमर्श हो रहा है। परिवार केवल निजी जीवन की इकाई नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सामाजिक संतुलन की आधारशिला भी है। दुनिया भर में संस्कृतियां और धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि पूरी मानव जाति एक बड़ा परिवार है, जो एकजुट होकर ही जीवित रह सकती है। परिवार के साथ शिक्षा और कल्याण ही भविष्य की ओर संकेत करता है कि परिवार की भूमिका केवल बच्चों को पालने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह शिक्षा का पहला केंद्र और कल्याण का स्थायी आधार है।

जीने की संस्कृति :

परिवार की प्रासंगिकता इसी बिंदु पर सबसे अधिक उभरकर सामने आती है कि परिवार केवल रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जीने की संस्कृति है। परिवार में बिताया गया समय निवेश है, व्यय नहीं। बच्चों के साथ संवाद, बुजुर्गों के साथ सहभागिता और रिश्तों के बीच संवेदनशीलता समाज के दीर्घकालिक स्वास्थ्य की गारंटी है। यदि आज परिवार टूट रहे हैं, तो उसका प्रभाव केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह सामाजिक असंतुलन, मानसिक तनाव और मूल्यहीनता के रूप में व्यापक रूप से सामने आएगा। इस संदर्भ में आवश्यक है कि हम परिवार को नए दृष्टिकोण से देखें। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। कार्य और परिवार के बीच प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण हो। डिजिटल सुविधाओं के साथ मानवीय संवाद को भी उतना ही महत्व दिया जाए। बच्चों के लिए समय निकालना दायित्व नहीं, बल्कि भविष्य के समाज में निवेश के रूप में समझा जाए।

शांत और सहयोगी :

बुजुर्गों को केवल सहारा नहीं, बल्कि मार्गदर्शक के रूप में पुन: स्वीकार किया जाए। परिवार ही हमें यह सिखाता है कि परिवार जितना सशक्त होगा, समाज उतना ही शांत और सहयोगी बनेगा। परिवारों में संवाद होगा तो समाज में टकराव कम होंगे। परिवारों में साझेदारी होगी, तो सहयोग की भावना मजबूत होगी। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी पारिवारिक परंपरा को बोझ नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान के रूप में देखे। अंतत: परिवार हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यदि परिवार सशक्त हुए तो शांति, साझेदारी और मानवीय मूल्यों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। भारतीय परिवार परंपरा आज भी प्रासंगिक है, आवश्यक है कि हम उसे समयानुकूल रूप देते हुए अपने जीवन के केंद्र में पुन: स्थापित करें, क्योंकि मजबूत परिवार ही मजबूत समाज और शांत विश्व की आधारशिला होते हैं।

-ललित गर्ग
यह लेखक के अपने विचार हैं।

Post Comment

Comment List

Latest News

मनरेगा में पहले काम के बदले बजट और अब बजट के बदले काम : जूली मनरेगा में पहले काम के बदले बजट और अब बजट के बदले काम : जूली
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने मनरेगा योजना के नाम और स्वरूप में बदलाव को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा।...
आंध्र प्रदेश में भीषण हादसा, ओएनजीसी कुएं से भारी गैस रिसाव, पूरे इलाके में मची सनसनी
हनुमानगढ़ जिले में कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए 10 तक अवकाश, आदेश की सख्ती से पालना के दिए निर्देश 
परवन वृहद सिंचाई परियोजना के लिए भूमि अवाप्ति की अधिसूचना जारी, परवन सिंचाई परियोजना को मिली रफ्तार
राजस्थान विश्वविद्यालय में अंबेडकर पीठ समाप्त करने के विरोध में NSUI का उग्र प्रदर्शन, जानें पूरा मामला 
फ्रांस: नए सामाजिक सुरक्षा बजट के विरोध में निजी डॉक्टरों की 10 दिनी हड़ताल शुरू, स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं
एसबीआई लाइफ की पहल: उदयन एनजीओ की बच्चियों ने महिला क्रिकेट टीम से की मुलाकात