भारत ने रूसी तेल आयात को लेकर अपने संकल्प पर मजबूती दिखाई, देश को 78,000 करोड़ से 98,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान 

रोक लगाने वाला कोई निर्देश जारी नहीं 

भारत ने रूसी तेल आयात को लेकर अपने संकल्प पर मजबूती दिखाई, देश को 78,000 करोड़ से 98,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान 
अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा है। सरकार इसे रणनीतिक और आर्थिक रूप से लाभकारी मानती है, जिससे सालाना 78,000-98,000 करोड़ रुपए की बचत होती है। अमेरिका ने ऊंचे शुल्क और प्रतिबंधों की चेतावनी दी है, लेकिन भारत ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।

नई दिल्ली। अमेरिका के दबाव को बिना शोर शराबे के खारिज करते हुए रूस से कच्चे तेल आयात जारी रखते हुए  सरकार ने अपने रणनीतिक संकल्प की मज़बूती का प्रदर्शन किया है। रूस से आयात करने के खिलाफ अमेरिका ने गत अगस्त से अपने बाजार में भारतीय सामानों पर 50% का दंडात्मक शुल्क दिया और चाहता है कि भारत रूसी तेल की खरीद बंद कर दे। तेल और गैर के लिए विदेशी स्रोतों पर पर अपनी बड़ी निर्भरता के बीच भारत रूस को तेल आयात एक भरोसेमंद और रणनीतिक आपूर्तिकर्ता मानता है। रूस से तेल आयात करने से भारत को सालाना 78,000 करोड़ से 98,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान है।

यूक्रेन के विरोध में रूस को मदद :

गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को रूसी तेल आयात करने के विरुद्ध कड़ी चेतावनी दे रखी है। अमेरिका कहा तर्क है कि  रूस को भारत से मिलने वाले तेल के मुनाफे से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद मिल रही है। ट्रम्प सरकार का कहना है कि रूस की आक्रामकता को रोकने के लिए भारत को रूसी तेल खरीदना बंद कर देना चाहिए नहीं तो उसे गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों और ऊंचे शुल्क का सामना करना पड़ेगा।  

रूसी कंपनियों पर कड़ी पाबंदियां :

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रूस से कच्चा तेल आयात जारी रखना एक ऐसे संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र  व्यवहार को दिखाता है जो अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देता है। भारत ने यह दृढता ऐसे समय दिखायी है जबकि अमेरिका ने रूसी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर कड़ी पाबंदियां लगा रखी है।  

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अक्टूबर में 26,250 करोड़ खर्च :

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रेला एडवाइजर्स के अनुसार अकेले अक्टूबर,2025 में भारत ने रूसी तेल खरीदने पर 26,250 करोड़ खर्च किये। उससे पहले सितंबर में भी भारत ने रूस से इतनी ही राशि का तेल आयात किया था। अमेरिका और चीन के बाद भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक में से एक बन गया है। यूक्रेन युद्ध से पहले, भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा सिर्फ 0.2 प्रतिशत था।

18 लाख बैरल का आयात :

यह आंकड़ा बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया और एक समय 65% तक पहुंच गया था। अब भारत की कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रूस से आता है। भारत औसतन एक दिन में 18 लाख बैरल का आयात कराता है। एक समय इसमें रूसी कच्चा तेल 12 लाख बैरल तक पहुंच गया था।

अमेरिका भी रूस से तेल लेता है :

उल्लेखनीय है कि अमेरिका खुद अपनी ज़रूरतों के लिए रूसी तेल आयात करता है, लेकिन वह भारत और रूस की कंपनियों पर ज़बरदस्त दबाव डाल रहा हैऔर प्रतिबंध लगा रहा है। ट्रंप ने भारत पर रूसी कच्चे तेल को रिफाइन करके और पेट्रोलियम उत्पादों को यूरोपीय देशों सहित निर्यात करके बड़ा मुनाफा कमाने का आरोप लगाया है। उन्होंने रूसी हथियार खरीदने पर भी भारत के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है।

कीमत सबसे महत्वपूर्ण कारक :

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर कुमार ने कहा है  कि तेल खरीद तय करने में कीमत सबसे महत्वपूर्ण कारक है। इसके अनुसार, भारत ने प्रतिबंधों से पहले और बाद में लगातार आयात बढ़ाया है। पिछले वर्ष जनवरी और जून के बीच, रिलायंस इंडस्ट्रीज, एचपीसीएल, मित्तल एनर्जी, मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड जैसी प्रमुख रिफाइनरियों ने बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल आयात किया।  

400 रुपए प्रति बैरल की बचत :

इतने ज़्यादा दबाव और बयानबाज़ी के बावजूद भारत ने रूसी तेल खरीदने की अपनी नीति से पीछे नहीं हटा, और अपने राष्ट्रीय आर्थिक हितों की रक्षा करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। रूसी कच्चे तेल को खरीदने से भारत को लगभग 400 रुपए प्रति बैरल की बचत हुई है। यह फायदा यूक्रेन युद्ध के बाद दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से नहीं मिल रहा था। भारत की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था की जरूरतों को देखते हुए इस आयात पर निर्भरता से बचा नहीं जा सकता।    

रोक लगाने वाला कोई निर्देश जारी नहीं :

अमेरिका के बढ़ते दबाव के बीच एचपीसीएल के चेयरमैन विकास कौशल ने कहा कि सरकार ने रूसी तेल आयात पर रोक लगाने वाला कोई निर्देश जारी नहीं किया है और खरीद के फैसले लागत-प्रभावशीलता और बाजार की रुचि के आधार पर तेल कंपनियों पर निर्भर करते हैं।


    
 

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