मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर रही

भारत का किसान कृषि कार्य में विशेषज्ञता प्राप्त

मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर रही

देवासुर संग्राम में असुरों के नायकों में बुद्धिमान, बलवान एवं अनेक गुण संपन्न नायक रहे हैं।

देवासुर संग्राम में असुरों के नायकों में बुद्धिमान, बलवान एवं अनेक गुण संपन्न नायक रहे हैं। भारत में हिरणकश्यप, रावण, कंस ख्यात नामो में है। यद्यपि हिरणयकश्यप के कुल में भक्त प्रहलाद, कंस के वंश में श्री कृष्ण तथा रावण के परिवार में विभीषण नायकों के रूप में प्रमुख रहे हैं। इससे यह तो स्पष्ट है कि असुर कोई अलग से जातीय पहचान नहीं थी वरन उनके कर्मों से ही उनकी गिनती असुरों के रूप में हुई। इसे तुलसीदास ने रामचरितमानस में सुमति कुमति सब के उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं। चौपाई में प्रकट किया है। इसी को राम भी चिरंतन है, रावण भी चिरंतन है। उक्ति में व्यक्त किया है। मानव अपने कर्मों के आधार पर ही सुर और असुर के रूप में अपनी पहचान बनाता है। भारत के प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी एवं अटल बिहारी वाजपेई ऐसा नेतृत्व रहा, जिनके सामनेअमेरिका की नहीं चल पाई। दोनों ने ही परमाणु विस्फोटों के समय अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का संज्ञान नहीं लिया, जिससे अमेरिका को स्वत अपने प्रतिबंध वापस लेने के लिए विवश होना पड़ा था।

आसुरी शक्ति तभी पनपती है, जब उसे समुचित रूप से चुनौती देने वाला नहीं होता है। जी.के. बिरला के अनुसार भारत स्वयं पूर्ण बाजार है। विश्व में उपभोक्ताओं की संख्या में भारत प्रथम स्थान पर है। इसी आधार पर दोनों प्रधानमंत्रियों की दृढ़ता के सामने अमेरिका को ही अपने कदम पीछे लेने पड़ेथे। दूसरा भारत कृषि प्रधान देश है। भारत के पास उपलब्ध संपूर्ण भूभाग में से 51% से अधिक भूभाग कृषि योग्य है अमेरिका में यह 16.57% है। कृषि उत्पादन की दृष्टि से भारत द्वितीय स्थान पर है, प्रथम एवं द्वितीय स्थान पर क्रमश चीन एवं अमेरिका हैं। भारत के उत्तर में हिमालय ठंडी हवाओं को रोकने वाला है, छ ऋतुओं का चक्र इस देश के लिए वरदान है। यहां की जलवायु की विविधता के कारण खाद्यान्न के अतिरिक्त फल, फूल, सब्जी,औषधि, मसाला उत्पादन में भारत का विश्व में विशिष्ट स्थान है। वर्षा, सर्दी, गर्मी विभिन्न प्रकार के खाद्यान्नों के उत्पादन के लिए अनुकूलता प्रदान करती है। सर्द देशों में फसल उत्पादन अवधि 8 माह तक की है, जबकि भारत में 2 और 3 माह की अवधि में भी फसलें उत्पादित होती है। भारत का किसान कृषि कार्य में विशेषज्ञता प्राप्त है।

इसलिए भारत का किसान अमेरिका के राष्ट्रपति से प्रतिस्पर्धा में भी अपना यथोचित स्थान बनाए हुए है। इसी से 20वीं सदी की विश्वव्यापी मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर बनी रही।  अभी भारत के अनेक अर्थशास्त्री ट्रंप टैरिफ को अवसर के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। यह एक प्रकार से ट्रंप टैरिफ के पक्ष में वातावरण बनाने जैसा है। वह यह भूल जाते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था का आधार सकल घरेलू उत्पाद का 70% तो घरेलू खपत पर निर्भर है। भारत का अमेरिका के साथ वर्ष 2024-25 का निर्यात 86-51 अरब डॉलर एवं आयात 45-33 अरब डॉलर और व्यापार अधिशेष 41-18 अरब डॉलर रहा है। जिसमें अमेरिका की आवश्यकतानुसार फार्मा, पेट्रोलियम पर अमेरिका ने आयात शुल्क आरोपित नहीं किया हुआ। भारत का निर्यात भारत की 1.9% जीडीपी को ही प्रभावित करता है। भारत पर 9 अप्रैल 2025 को ट्रंप टैरिफ का आगाज 26% टैरिफ आरोपित कर किया गया है। अमेरिकी टैरिफ के पक्षधर प्रसन्न होकर इसे भारत के लिए अवसर बता रहे हैं कि चीन पर 34%, वियतनाम पर 46%, बांग्लादेश पर 37% की तुलना में भारत पर टैरिफ कम है और यह भी युक्ति गढ़ रहे हैं कि भारतकोष से तीन से आठ अरब डॉलर की ही हानि होगी। जबकि उसकी तुलना में अवसरों की संभावना अधिक है। इसके लिए नोमुरा के प्रतिवेदन का उल्लेख कर रहे हैं जिसके अनुसार भारत सबसे कम प्रभावित होने वाला देश है।

इसमें इस युक्ति का भी सहारा लिया जा रहा है कि टेक्सटाइल क्षेत्र में भारत को लाभ होने से 2027 तक 5 लाख नौकरियां बढ़ेगी। वहीं ट्रंप टैरिफ को 90 दिन के लिए स्थगित करने पर भी ताली बजा रहे हैं। जबकि अभी इस टैरिफ के कारण से विश्व भर में अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। इस 90 दिन की अवधि के लिए रोक का कारण अमेरिका शेयर और ब्रांड बाजार में अप्रत्याशित गिरावट के साथ बढ़ते व्यापार असंतुलन और तरलता संकट, ऋण आय असंतुलन, टेस्ला का एशियाई कारोबारी चीनी कंपनी के हाथों खोना तथा फेडरल रिजर्व बैंक की चेतावनी कि टैरिफ वृद्धि से उपजी अनिश्चितता स्थायी आर्थिक हानि पहुंचा सकती है, जिससे पूर्ण रोजगार बढ़ाने और महंगाई नियंत्रित रखने के लक्ष्य प्राप्ति खतरे में होगी। सर्वे भवंतु सुखिन की भावना देवत्व की ओर ले जाती है तथा सबका अहित करके स्वयं का हित साधने की भावना आसुरी वृत्ति की ओर ले जाती है।  

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-रामपाल जाट
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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