International Nurses Day : इंसानी सेवा की अथक मिसाल हैं नर्सें

आधुनिक नर्सिंग आंदोलन की जन्मदाता फ्लोरेंस नाइटेंगल

International Nurses Day : इंसानी सेवा की अथक मिसाल हैं नर्सें
नर्सों के समर्पण भाव, उनकी अथक मेहनत और मरीजों की गुणवत्तापूर्ण देखभाल की बदौलत ही समूची स्वास्थ्य प्रणाली टिकी हुई है।

आधुनिक नर्सिंग आंदोलन की जन्मदाता फ्लोरेंस नाइटेंगल, जिन्हें विद द लैंप भी कहा जाता है,उनका जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। फ्लोरेंस नाइटेंगल ने  युद्ध में घायल सिपाहियों की देखरेख का एक ऐसा उच्चस्तरीय मानदंड स्थापित किया था कि उनके जन्मदिन को दुनिया के 130 से भी ज्यादा देशों में अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है।  इस समय दुनिया में 3 करोड़ के आसपास नर्स हैं और अगर कहा जाए कि दुनिया के स्वास्थ्य का सारा दारोमदार उनकी ही अथक मेहनत और इंसानी सेवा के लिए दिखाए जाने वाले उनके समर्पण भाव पर टिका है, तो अतिश्योक्ति न होगी। ये नर्स ही होती हैं, जो किसी बीमार व्यक्ति का सबसे ज्यादा ख्याल रखती है। 
नर्सों के समर्पण भाव, उनकी अथक मेहनत और मरीजों की गुणवत्तापूर्ण देखभाल की बदौलत ही समूची स्वास्थ्य प्रणाली टिकी हुई है। इसलिए जरूरी है कि नर्सिंग पेशे के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध हों, उन्हें वित्तीय संकट से न गुजरना पड़े वरना दुनियाभर का स्वास्थ्य ढांचा चरमरा जाता है। साल 2024 के लिए इंटरनेशनल नर्स डे की थीम है- नर्सों को सशक्त बनाना, स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को मजबूत करना है। इस थीम से पता चलता है कि आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में नर्सों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। 
दो साल पहले दुनिया को अपनी हाहाकारी गिरफ्त में लेने वाली कोरोना महामारी के समय नर्सों की महत्ता पूरी दुनिया ने न सिर्फ  महसूसा था बल्कि उन्हीं के हाथों में इंसान की जिंदगी आकर टिक गई थी और यह कोई पहली बार नहीं हुआ, हमेशा से स्वास्थ्य देखभाल की दुनिया नर्सों पर ही टिकी रही है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि अगर दुनिया के स्वास्थ्य को सुरक्षित और मजबूत बनाना है तो जरूरी है कि हम नर्सिंग जैसी संस्था को मजबूत बनाया जाए।

फ्लोरेंस नाइटेंगल जिनके नाम पर आज पूरी दुनिया में नर्स डे मनाया जाता है और जो आधुनिक नर्स पेशे की आधार हैंए उनकी अथक मेहनत और इंसान के प्रति समर्पण भाव ही दरअसल नर्सिंग पेशे की आत्मा है। फ्लोरेंस नाइटेंगल सिर्फ नर्स ही नहीं थीं, वह अपने जमाने की नर्सए समाज सुधारक और आधुनिक नर्सिंग पेशे की संस्थापक और दार्शनिक थीं।
क्रीमिया युद्ध के दौरान 1858 में नाइटेंगल को ब्रिटेन और सहयोगी देशों के सैनिकों की देखभाल के लिए तुर्की में तैनात किया गया था। वह घायल सैनिकों की दिनरात सेवा में लगी रहती थीं और देर रात, लालटेन लिए अस्पतालों का चक्कर लगाती रहती थीं, इसलिए उनका नाम लेडी विद द लैंप पड़ गया। उस साल यानी 1887 में उनकी सैनिकों के लिए की गई इस महान सेवा की सराहना ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया और राजकुमार अलबर्ट ने भी किया था। 

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