अलकनंदा बेसिन के ऊपर कई नई ग्लेशियल झीलें बनीं
57 नई ग्लेशियल झीलें
हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, वे केवल बर्फ ही नहीं खो रहे बल्कि अपने पीछे बड़ी-बड़ी झीलें छोड़ रहे हैं, इन झीलों का बढ़ता आकार पहाड़ी क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है, अलकनंदा बेसिन पर की गई एक नई स्टडी ने इस बदलते जल परिदृश्य की डरावनी तस्वीर पेश की है। स्टडी के अनुसार, 1994 से 2023 के बीच 24 ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल 0.97 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1.62 वर्ग किलोमीटर हो गया, यानी इस दौरान 57 नई ग्लेशियल झीलें भी बनीं हैं।
कुछ झीलों का विस्तार बेहद तेज रहा, वसुंधरा झील का क्षेत्रफल 261 प्रतिशत और बलबाला झील का 119 प्रतिशत बढ़ा, शोधकर्ताओं ने 27 ऐसी झीलों की पहचान की है जिनके आकार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, इनमें बद्रीनाथ मंदिर जैसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के ऊपर स्थित एक झील भी शामिल है। प्राग स्थित चार्ल्स यूनिवर्सिटी से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर आयुषी पांडेय के नेतृत्व में यह शोध किया गया। इसमें लैंडसेट और सेंटिनल.2 सैटेलाइटों के आंकड़ों की मदद से 74 ग्लेशियल झीलों में हुए बदलावों का एनालिसिस किया गया, नतीजे बताते हैं कि अलकनंदा बेसिन में झीलों की कुल संख्या बढ़कर 131 हो गई है। ग्लेशियल झीलें पिघलते ग्लेशियरों से आने वाले पानी से बनती और बढ़ती हैं, इन्हें बर्फ, चट्टान या मलबे से बनी प्राकृतिक संरचनाएं रोककर रखती हैं, जब ये कमजोर पड़ते हैं या अचानक टूट जाते हैं तो झील में जमा भारी मात्रा में पानी तेज गति से नीचे की ओर बह निकलता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है, यह बहाव अपने साथ चट्टानें, मिट्टी और मलबा लेकर आता है, इससे सड़कें, पुल, घर, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स और अन्य बुनियादी सुविधाएं कुछ ही समय में तबाह हो सकती हैं। स्टडी में जिन झीलों का तेजी से विस्तार हुआ है वे इसलिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि उनके किनारे या रोकने वाली संरचनाएं अस्थिर हो सकती हैं, बद्रीनाथ के ऊपर स्थित झील का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीचे तीर्थस्थल और आबादी वाले क्षेत्र हैं, किसी भी अचानक बहाव का असर दूर तक पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि सैटेलाइट निगरानी से खतरे वाली झीलों की पहचान में मदद मिलती है, लैंडसेट और सेंटिनल.2 जैसे सैटेलाइटों से नई झीलों का पता लगाना, उनके आकार में बदलाव ट्रैक करना, तेजी से बढ़ रही झीलों को चिन्हित करना संभव है, इससे उन झीलों की सूची बनाई जा सकती है जिनकी जमीन पर विस्तृत जांच जरूरी है, लेकिन केवल सैटेलाइट डेटा पर्याप्त नहीं है।
झील की गहराई, उसमें मौजूद पानी की मात्रा, आसपास की ढलानों की स्थिरता, संभावित बहाव का रास्ता और ग्लेशियर झील संबंधों का स्टडी करने के लिए मैदानी जांच बेहद जरूरी है, दुर्गम हिमालयी इलाकों में यह काम चुनौतीपूर्ण है।

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