बदलती जीवनशैली के साथ बदल गए बर्तन

बर्तनों और खान-पान के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध पाया जाता 

बदलती जीवनशैली के साथ बदल गए बर्तन

खान-पान के लिहाज से भारतीय संस्कृति बहुत ही धनवान या यूं कहें कि बहुत ही समृद्ध रही है।

खान-पान के लिहाज से भारतीय संस्कृति बहुत ही धनवान या यूं कहें कि बहुत ही समृद्ध रही है। जब भी हम खान-पान करते हैं तो किसी न किसी बरतन में करते हैं। दरअसल, बर्तनों और खान-पान के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध पाया जाता है। समय के साथ जैसे जैसे हम विकास की ऊंचाइयों को छूते चले जा रहे हैं, वैसे-वैसे ही हम नए युग में प्रवेश करते हुए अपने खान-पान के बर्तनों को भी बदलते चले जा रहे हैं। प्राचीन काल में मिट्टी, तांबे, कांसे, लोहे, पीतल से बने बर्तनों का प्रयोग किया जाता था, यहां तक जानकारी मिलती है कि प्राचीन काल में लोग लकड़ी तक से बने बर्तनों, जैसे कि कटोरे और प्लेटों का उपयोग भी करते थे, लेकिन आज हम प्लास्टिक, एल्युमिनियम, बोन चाइना, डिस्पोजेबल आदि का प्रयोग करने लगे हैं। सच तो यह है कि जैसे-जैसे सभ्यताएं विकसित हुईं, लोगों ने अनेक प्रकार की धातुओं से बने बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो भोजन परोसने और खाने के लिए अधिक सुविधाजनक, सुंदर और अच्छे थे। 

दरअसल, प्राचीन समय में भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तन और तरीकों में बहुत ही विभिन्नता थी, जो उनकी संस्कृति, जलवायु और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती थी, आज विकास के पथ पर अग्रसर होते हुए आधुनिक जरूर हो गए हैं, लेकिन आज बहुत सी धातुएं ऐसी आ चुकीं हैं, जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहीं हैं। मिट्टी के बर्तनों में पोषक तत्व नष्ट नहीं होते और भोजन अधिक स्वादिष्ट बनता है। इन बर्तनों में पके हुए खाने से आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इनके बर्तनों में खाना पकाने से हर बीमारी दूर रहती हैं। पहले अमीर और शाही लोगों द्वारा सोने के बर्तनों में खाना खाया जाता था, इससे तन मजबूत होता है, हमारे पाचन में सुधार होता है, हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मन को शांत रखने में सहायता मिलती है। आयुर्वेद में सोने को सात्विक धातु भी कहा जाता है। सोने के बर्तन में खाना खाने से याददाश्त तेज होती है, जो कि अल्जाइमर जैसी बीमारियों में भी फायदेमंद हो सकता है। 

चांदी के बर्तनों में खाने से मन मजबूत होता है, रक्त का प्रवाह संतुलित रहता है। चांदी के बर्तनों में जीवाणुरोधी गुण होते हैं, जो भोजन को हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया से बचाए रखते हैं। चांदी हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है तथा चांदी में गैर-विषैले गुण होने के कारण, इसके बर्तनों में भोजन सुरक्षित होता है। यह खाने को ताजा रखती है। कांसा में ऐसे अनोखे गुण हैं, जो इसे आयुर्वेद में मूल्यवान बनाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार कांसा को सात्विक धातु माना जाता है, जो शुद्धता, स्पष्टता और समग्र कल्याण को बढ़ावा देता है। कांसे के बर्तनों में खाना पकाने और खाने से तीन दोषों को संतुलित करने में मदद मिल सकती है, जिससे पाचन में सुधार होता है, प्रतिरक्षा में वृद्धि होती है और अम्लता और सूजन में कमी आती है। ताम्बे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, जठराग्नि शांत रहती है। 

लीवर सम्बंधी समस्याएं दूर होती हैं, ताम्बे का पानी शरीर के सभी विषैले तत्वों को नष्ट कर देता है। तांबा हमारे शरीर के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है और पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है। पीतल के बर्तन तांबे और जस्ते का मिश्रण होता है, जो शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। इसके अलावा, पीतल में रोगाणुरोधी गुण होते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करते हैं और पाचन क्रिया को बेहतर बनाते हैं। लोहे के बर्तनों में खाना पकाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ती है, जैसा कि लोहे के बर्तन में फोलिक एसिड पाया जाता है, जिससे शरीर में आयरन की कमी दूर होती है। 

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स्टील के बर्तन स्वास्थ्य की दृष्टि से नुकसानदायक नहीं होते हैं, क्योंकि ये न ही गर्म पदार्थों से कोई क्रिया ही करते है और न ही ठंडा होने पर, लेकिन इनका अधिक फायदा नहीं होता है। एल्युमीनियम के बर्तनों में खाना पकाने से एल्युमीनियम खाने में मौजूद आयरन और कैल्शियम जैसे महत्वपूर्ण तत्वों को अवशोषित कर लेता है, जिससे शरीर में इन तत्वों की कमी हो सकती हैऔर कुछ मामलों में, मानसिक बीमारियां भी हो सकती हैं। प्लास्टिक में मौजूद रसायन और माइक्रोप्लास्टिक भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे विभिन्न स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

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-सुनील कुमार महला
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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