सामर्थ्य की ओर बढ़ता ग्रामीण रोजगार

सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास कार्ययोजना 

सामर्थ्य की ओर बढ़ता ग्रामीण रोजगार

भारत के ग्रामीण परिदृश्य में अब राहत के साथ सामर्थ्य और स्थाई संपत्ति के निर्माण का दौर प्रारंभ हो गया है।

भारत के ग्रामीण परिदृश्य में अब राहत के साथ सामर्थ्य और स्थाई संपत्ति के निर्माण का दौर प्रारंभ हो गया है। संसद द्वारा पारित विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 में वर्ष 2047 के विकसित भारत की नींव में रखी गई वह ईंट है, जो गांव, गरीब और किसान को समृद्ध बनाने को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह अधिनियम मनरेगा से आगे की यात्रा है। मनरेगा ने दो दशकों तक सुरक्षा तो दी, लेकिन सृजन की गति को आज की वैश्विक और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप अपेक्षित ऊर्जा प्रदान नहीं कर पाई। किसी भी राष्ट्र की प्रगति तब पूर्ण होती है जब उसकी अंतिम इकाई गांव भी आत्मनिर्भर हो जाए। मनरेगा ने निस्संदेह ग्रामीण संकट के समय एक ढाल का काम किया, लेकिन बदलते समय, जलवायु परिवर्तन के अनिश्चित चक्र और तकनीकी क्रांति ने एक ऐसे ढांचे की मांग की थी, जो काम देने के बजाय आजीविका सृजित करने पर केंद्रित हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन के अनुरूप, वीबी-जी राम जी अधिनियम ने इसी शून्य को भरने का कार्य किया है। रोजगार की गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करना ग्रामीण परिवारों की क्रय शक्ति और उपभोग सुरक्षा को बढ़ाने की दिशा में एक साहसिक कदम है।

अधिनियम एक वरदान बनकर उभरा :

राजस्थान जैसे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले प्रदेश में यह अधिनियम एक वरदान बनकर उभरा है। राज्य में मानसून की अनिश्चितता और कृषि कायोंर् की मौसमी प्रकृति के कारण अक्सर किसानों और सरकारी श्रम योजनाओं के बीच एक अदृश्य संघर्ष देखा जाता रहा है। कटाई और बुवाई के समय मजदूरों की कमी किसानों के लिए लागत का संकट पैदा करती थी। मुख्य कृषि मौसम के दौरान वार्षिक 60 दिनों का कार्य-विराम घोषित करने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया है। यह दर्शाता है कि कानून बनाने वालों ने धरातल की समस्याओं को गहराई से समझा है। यह प्रावधान किसान और मजदूर को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सहयोगी बनाता है। रोजगार के 125 दिनों की बढ़ी हुई गारंटी यह सुनिश्चित करती है कि श्रमिक की आय कम न हो, जबकि कृषि क्षेत्र को समय पर श्रम शक्ति उपलब्ध हो सके। यह नीतिगत परिपक्वता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

कार्य की वास्तविकता पर नजर :

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पत्रकारिता के दृष्टिकोण से देखें तो ग्रामीण योजनाओं की सबसे बड़ी त्रासदी लीकेज और भ्रष्टाचार रही है। पुराने तंत्र में फ र्जी मस्टर रोल और बिचौलियों का बोलबाला लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा था। नए अधिनियम ने डिजिटल आर्किटेक्चर को अनिवार्य कानूनी दर्जा देकर भ्रष्टाचार के दरवाजे हमेशा के लिए बंद करने की कोशिश की है। बायोमेट्रिक उपस्थिति, जियोटैगिंग और लाइव डैशबोर्ड के माध्यम से अब दिल्ली या जयपुर में बैठा अधिकारी भी दूरदराज के गांव में हो रहे कार्य की वास्तविकता देख सकता है। राजस्थान पहले से ही जन-सूचना पोर्टल के माध्यम से पारदर्शिता के मॉडल पर काम कर रहा है, लेकिन अब इस तकनीक-समर्थ निगरानी से कागजी मजदूरों का खेल समाप्त हो जाएगा। यह केवल तकनीक नहीं, बल्कि लोकतंत्र का शुद्धिकरण है।

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चार ठोस श्रेणियों में विभाजित :

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किसी भी कल्याणकारी योजना की सफ लता उसके भुगतान की गति पर निर्भर करती है। काम के बदले दाम में देरी श्रमिक के मनोबल को तोड़ती है। नए अधिनियम में साप्ताहिक भुगतान की व्यवस्था और 14 दिनों से अधिक की देरी पर स्वत: मुआवजे का प्रावधान नौकरशाही की जवाबदेही तय करता है। यह राजस्थान के उन लाखों श्रमिकों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है, जिनकी रसोई की आग दैनिक या साप्ताहिक मजदूरी से जलती है। प्रशासनिक व्यय की सीमा को 6% से बढ़ाकर 9% करने से राज्य सरकारें तकनीक, प्रशिक्षण और बेहतर निगरानी के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध करवा सकेंगी। यह अतिरिक्त 3% निवेश, वास्तव में भ्रष्टाचार को रोकने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने का प्रीमियम है।

सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास कार्ययोजना :

लोकतंत्र में सोशल ऑडिट के दर्पण में शासन अपना चेहरा देखता है। हर छह महीने में अनिवार्य ऑडिट, डिजिटल साक्ष्यों की सार्वजनिक उपलब्धता और जिला स्तरीय लोकपाल की व्यवस्था की गई है। साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण की बाध्यता ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच एक नई जवाबदेही पैदा की है। विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) 2025 ग्रामीण भारत की गरिमा का घोषणापत्र है। यह अधिनियम बताता है कि सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास एक कार्ययोजना है। राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में, यह अधिनियम मरूभूमि की चुनौतियों को अवसर में बदलने का सामर्थ्य रखता है। यह रोजगार को दान के बजाय अधिकार और उत्पादकता से जोड़ता है। यह अधिनियम ग्रामीण भारत के आर्थिक क्षितिज पर एक नया सूर्योदय है।

- गुलाब बत्रा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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