सरस्वती पूजा की परंपरा और आधुनिकता 

अंधकार से प्रकाश की ओर 

सरस्वती पूजा की परंपरा और आधुनिकता 

सरस्वती पूजा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत पवित्र, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण पर्व है।

सरस्वती पूजा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत पवित्र, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण पर्व है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना में रची बसी उस जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें ज्ञान, विवेक, वाणी, कला और संस्कार को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मां सरस्वती को श्वेत वस्त्रों में विराजमान, शांत, सौम्य और करुणामयी देवी के रूप में देखा गया है, जिनके एक हाथ में वीणा है, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथे में वर मुद्रा। यह स्वरूप स्वयं यह संदेश देता है कि जीवन में ज्ञान का संगीत, अध्ययन की निरंतरता, साधना का अनुशासन और विवेकपूर्ण आचरण कितना आवश्यक है।

ऋतु परिवर्तन होना :

बसंत पंचमी के दिन मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा का संबंध ऋतु परिवर्तन से भी है,जब प्रकृति नवजीवन से भर उठती है और मानव मन भी सृजन, अध्ययन और आत्मविकास की ओर प्रवृत्त होता है। परंपरागत रूप से सरस्वती पूजा का वातावरण अत्यंत शांत, मर्यादित और सात्त्विक रहा है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, गुरुकुलों और घरों में इस दिन पुस्तकों, कॉपियों, कलम, वाद्य यंत्रों और कला से जुड़े उपकरणों की पूजा की जाती रही है। विद्यार्थी मां सरस्वती से केवल परीक्षा में सफलता नहीं, बल्कि सही विवेक, एकाग्रता और सद्बुद्धि की कामना करते रहे हैं। भजन, श्लोक, वंदना और मधुर संगीत के माध्यम से ऐसा वातावरण बनाया जाता था यह पर्व जीवन में मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली शक्ति है।

हमारी सांस्कृतिक चेतना :

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किन्तु वर्तमान समय में सरस्वती पूजा के स्वरूप में जो परिवर्तन देखने को मिल रहा है, वह गहरी चिंता का विषय है। कई स्थानों पर यह पवित्र पर्व अब शोर, प्रदर्शन और उन्माद का पर्याय बनता जा रहा है। तेज़ डीजे, कानफोड़ू आर्केस्ट्रा, फिल्मी और अश्लील गीत, तथा उन्मादी नृत्य पूजा की मूल भावना को पूरी तरह से विकृत कर रहे हैं। विद्या की देवी, जिनका स्वरूप ही शांति और संयम का प्रतीक है, उन्हीं के नाम पर जब अश्लीलता, अभद्रता और अनुशासनहीनता परोसी जाती है, तो यह केवल धार्मिक भावना को आहत करने का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना के पतन का स्पष्ट संकेत बन जाता है।

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पूजा का उद्देश्य :

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आज पूजा समितियों के बीच यह होड़ देखी जाती है कि कौन बड़ा पंडाल लगाएगा, किसका साउंड सिस्टम सबसे ज़्यादा तेज़ होगा और किसकी भीड़ सबसे अधिक होगी। श्रद्धा का स्थान प्रदर्शन ने ले लिया है और साधना का स्थान शोर ने। ऐसे में पूजा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और आयोजन केवल मनोरंजन या शक्ति प्रदर्शन का मंच बनकर रह जाता है। इस माहौल में युवा वर्ग, जो स्वाभाविक रूप से ऊर्जा और उत्साह से भरा होता है, अक्सर बहक जाता है और मर्यादा की सीमाएं टूटने लगती हैं। जब धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और स्पष्ट दिशा का अभाव होता है, तब सामाजिक अव्यवस्था जन्म लेती है। तेज़ संगीत, नशे का सेवन, उकसाने वाले गीत और भीड़ का उन्माद मिलकर हिंसा तक की स्थिति पैदा कर देते हैं।

शैक्षिक और सांस्कृतिक पर्व :

सरस्वती पूजा जैसे शैक्षिक और सांस्कृतिक पर्व पर यदि ऐसी घटनाएं घटित हों, तो यह समाज के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक संकट भी है, जो धीरे धीरे समाज की जड़ों को खोखला करता है। इस स्थिति का सबसे गंभीर प्रभाव बच्चों और विद्यार्थियों पर पड़ता है। सरस्वती पूजा का पर्व उनके लिए विद्या, अनुशासन और संस्कार सीखने का अवसर होना चाहिए, परंतु जब वे देखते हैं कि इसी पर्व पर शोर, अश्लीलता और झगड़े हो रहे हैं, तो उनके मन में पूजा और परंपरा के प्रति सम्मान कम होने लगता है। यह सोच आने वाली पीढ़ी के चरित्र निर्माण के लिए अत्यंत घातक हो सकती है।

अंधकार से प्रकाश की ओर :

यह भी विचारणीय है कि मां सरस्वती का दर्शन भारतीय दर्शन में केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है। सरस्वती ज्ञान की धारा हैं, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती हैं। उनका वाहन हंस विवेक का प्रतीक है, जो दूध और पानी को अलग कर सकता है। ऐसे में यदि हम सरस्वती पूजा के नाम पर अविवेक, उन्माद और अराजकता को बढ़ावा देते हैं, तो यह स्वयं देवी के प्रतीकात्मक संदेश का अपमान है। यह विरोधाभास हमारी सोच और आचरण के बीच बढ़ती दूरी को उजागर करता है।इस समस्या का समाधान केवल प्रशासनिक सख्ती से संभव नहीं है। यद्यपि ध्वनि प्रदूषण और कानून व्यवस्था को लेकर नियम आवश्यक हैं।

ज्ञान और संस्कृति का उत्सव :

सरस्वती पूजा को फिर से ज्ञान और संस्कृति का उत्सव बनाया जा सकता है। इस अवसर पर कवि गोष्ठियां, पुस्तक प्रदर्शनियां, वाद विवाद प्रतियोगिताएं, शास्त्रीय संगीत, लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और शैक्षिक संवाद आयोजित किए जा सकते हैं। ऐसे कार्यक्रम न केवल पूजा की गरिमा बनाए रखते हैं, बल्कि युवाओं को सकारात्मक दिशा भी देते हैं। रंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आधुनिक साधनों का उपयोग हो, परंतु मूल भाव और मर्यादा सुरक्षित रहें। सरस्वती पूजा का मूल भाव शांति, ज्ञान और संयम है, और जब हम इस भाव को अपने आचरण में उतारेंगे, तभी यह पर्व अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा और समाज को सही दिशा देने में सक्षम होगा।

-नृपेन्द्र अभिषेक नृप
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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