विस्तृत सैटेलाइट आधारित वैज्ञानिक अध्ययन जारी : पहाड़ियां उजड़ने का करोड़ों लोगों पर पड़ेगा असर, इन्हें नष्ट करने से उपजाऊ मैदान भी बदल सकते हैं रेगिस्तान में
सरकारी मानकों के कारण कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया
अरावली की कुल पहाड़ी भूमि का 31.8 प्रतिशत हिस्सा 100 मीटर से कम ऊंचाई का है, जिसे वर्तमान सरकारी मानकों के कारण कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है।
जयपुर। पर्यावरण संरक्षण समूह वी आर अरावली की ओर से शनिवार को जयपुर स्थित एक निजी कैफे में अरावली पवर्तमाला पर सरकार के मौजूदा दृष्टिकोण को चुनौती देता हुआ एक विस्तृत सैटेलाइट आधारित वैज्ञानिक अध्ययन जारी किया। इस अवसर पर क्लाइमेट साइंटिस्ट डॉ.सुधांशु भी मौजूद रहे। मीडिया कंवीनर डॉ. तनमय ने बताया कि यह स्वतंत्र विश्लेषण जीएसआई वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा ब्रिस्टोल फेबडेम के आधार पर किया गया है। अध्ययन से यह सामने आया है कि अरावली की कुल पहाड़ी भूमि का 31.8 प्रतिशत हिस्सा 100 मीटर से कम ऊंचाई का है, जिसे वर्तमान सरकारी मानकों के कारण कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है।
वी आर अरावली का दावा है कि इस अध्ययन से जुड़ा पूरा डेटा और इंटरैक्टिव मैप संस्था की वेबसाइट पर उपलब्ध है। डॉ.सुधांशु ने कहा कि इस निम्न ऊंचाई वाली पहाड़ियों से संरक्षण हटने का सीधा असर लगभग 30 करोड़ लोगों पर पड़ेगा। अध्ययन बताता है कि ये पहाड़ियां उन खाली गैप्स में स्थित हैं, जहां थार रेगिस्तान पहले से फैल रहा है। इन्हें नष्ट करने से उपजाऊ मैदान भी रेगिस्तान में बदल सकते हैं। जयपुर, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे जल संकटग्रस्त शहरों के लिए यही क्षेत्र मुख्य भूजल पुनर्भरण जोन है।
अरावली धूल को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। इन पहाड़ियों में खनन से दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 प्रदूषण और बढ़ेगा। जिससे स्वास्थ संकट गहराएगा। सभी प्रकार के खनन पर तुरंत रोक लगाने के साथ ही अन्य मांगे भी रखी।

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