महर्षि अरविन्द ने अनुभूतिपरक ज्ञान से स्पष्ट किया वेदों का अर्थ : वरखेड़ी

प्राचीन वैदिक ऋषियों ने वेद मंत्रों का साक्षात्कार किया था

महर्षि अरविन्द ने अनुभूतिपरक ज्ञान से स्पष्ट किया वेदों का अर्थ : वरखेड़ी

दूसरा इस आध्यात्मिकता को दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान और आलोचनात्मक ज्ञान के नए रूपों में प्रचारित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

जयपुर। महर्षि अरविंद घोष के वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प के साथ केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, अरविंद समिति और साक्षी ट्रस्ट बंगलुरु के संयुक्त तत्वावधान में ‘लिविंग वेद अरविंद के आलोक में वेद की आधुनिक व्याख्या’ विषयक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन रविवार को सम्पन्न हो गया। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो.श्रीनिवासा वरखेड़ी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत के आलोक में महर्षि अरविंद ने वेदों के एक ऐसे अर्थ को उद्घाटित किया, जो कि उनका अनुभूतिपरक ज्ञान था। चेतना के जिस स्तर पर प्राचीन वैदिक ऋषियों ने वेद मंत्रों का साक्षात्कार किया था, सहस्राब्दियों के बाद एक महापुरुष ने फिर उसी स्तर पर पहुंचकर उनका अनुभव कर उस गुप्त कोष को सभी के लिए प्रकट कर दिया। अरविंद एक अद्भुत दार्शनिक, कवि, योगी, राजनीतिज्ञ, सामाजिक चिंतक और भविष्यद्रष्टा थे। उज्जैन से आए प्रो. विरूपाक्ष जड्डीपाल ने कहा कि अरविंद के अनुसार स्वतंत्र भारत को तीन ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कार्य करना चाहिए, जिससे वैश्विक स्तर पर मानव चेतना के विकास की दिशा निर्धारित होगी। पहला प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभव को उसकी संपूर्ण महिमा, गहनता और परिपूर्णता के साथ प्रस्तुत करने का महान प्रयास किया जाना चाहिए। दूसरा इस आध्यात्मिकता को दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान और आलोचनात्मक ज्ञान के नए रूपों में प्रचारित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। तीसरा भारतीय भावना के आलोक में आधुनिक चुनौतियों से निपटने का एक भौतिक तरीका होना चाहिए। दूसरे दिन राउंड टेबल में डॉ.आर नारायण स्वामी, डॉ.परीक्षित सिंह, डॉ.आलोक पांडेय, प्रो. रेणुका राठौड़ सहित अन्य विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। 

क्या बताया सार 
दो दिन तक संगोष्ठी में पढ़े गए शोध पत्रों का सार प्रस्तुत करते हुए प्रो रेणुका राठौड़ ने कहा कि अरविंद के वेदों के प्रति असीम अनुराग एवं श्रद्धा का सबसे हृदयस्पर्शी प्रमाण है कि उन्होंने अपनी प्रमुखतम दार्शनिक पुस्तक ‘द लाइफ  डिवाइन’ के प्रत्येक अध्याय का प्रारंभ भारत की ऋषि परंपरा को अपने प्रणाम निवेदन तथा चिंतन सूत्र के रूप में एक वैदिक मंत्र को मूल रूप में उद्धृत कर उसके भावानुवाद द्वारा किया है। 

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