ओटीएस चौराहे पर फ्लाईओवर बनाने के लिए नई डीपीआर बनाने का आदेश रद्द, हाईकोर्ट ने कहा- मुख्य सचिव दोषी अफसरों पर करें कार्रवाई

सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करें

ओटीएस चौराहे पर फ्लाईओवर बनाने के लिए नई डीपीआर बनाने का आदेश रद्द, हाईकोर्ट ने कहा- मुख्य सचिव दोषी अफसरों पर करें कार्रवाई
हाईकोर्ट ने ओटीएस चौराहे पर 83 करोड़ रुपये के फ्लाईओवर के लिए नई डीपीआर बनाने का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने जेडीए को पुराने अनुबंध के आधार पर परियोजना आगे बढ़ाने और ठेका निरस्त करने की जांच कर दोषी अधिकारियों पर दो माह में कार्रवाई के निर्देश दिए।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जेएलएन मार्ग स्थित ओटीएस चौराहे पर 83 करोड़ रुपए की लागत से फ्लाई ओवर बनाने के लिए नए सिरे से डीपीआर बनाने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने जेडीए को कहा है कि वह पूर्व में हुए अनुबंध के आधार पर ही प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाए। अदालत ने पूर्व का अनुबंध निरस्त करने के कारणों की जांच करने के आदेश दिए हैं, ताकि जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय की जा सके। अदालत ने मुख्य सचिव को कहा है कि वे दोषी अफसरों पर दो माह में उचित कार्रवाई करें। जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने यह आदेश जेसीएल इंफ्रा प्रा. लि. की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया प्रभारी अधिकारी की ओर से अदालत में गलत बयानबाजी की गई है, जिसके तथ्य रिकॉर्ड से अलग पाए गए हैं। ऐसे में सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करें।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को निष्पक्ष और तर्कसंगत तरीके से काम करना होगा। राजनीतिक कारणों से सरकार अपने संविदात्मक दायित्वों से बच नहीं सकती है। जेडीए एक तरफ कह रहा है कि कंपनी की वजह से देरी हुई, लेकिन दूसरी ओर जेडीए ने बिना जुर्माने के कपनी को उसकी बैंक गारंटी लौटा दी। यह कृत्य अदालत को गुमराह करने वाला है। याचिका में कहा गया कि जेडीए ने ओटीएस चोराहे को सिग्नल फ्री और सौन्दर्यीकरण कराने को लेकर टेंडर निकाले। याचिकाकर्ता को टेंडर मिलने के बाद कंपनी को 6 जनवरी 2023 से 5 जनवरी, 2024 तक काम पूरा करना था। इसी बीच सरकार बदलने के बाद जेडीए ने अनुबंध की शर्तों का हवाला देते हुए 24 अप्रैल, 2024 को ठेका वापस ले लिया। इसके बाद 16 दिसंबर को याचिकाकर्ता की बैंक गारंटी भी वापस कर दी। वहीं 3 अप्रैल, 2025 को डीपीआर बनाने के लिए नया टेंडर जारी कर दिया।

इसको चुनौती देते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता को दिया ठेका बिना कारण वापस लिया गया है, जबकि कंपनी ने ड्रॉइंग्स और डिजाइन तैयार कर अनुमोदन के लिए पेश कर दिए थे। उनकी ओर से प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त संसाधन जुटा लिए गए थे, लेकिन जरूरी अनुमतियां व साइट पर जमीन मुहैया नहीं कराने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका। इसके अलावा नई डीपीआर के लिए टेंडर निकालना पहले से तैयार डीपीआर और प्रोजेक्ट को निरस्त करने जैसा है। इसका विरोध करते हुए जेडीए के अधिवक्ता अमित कुडी ने कहा कि याचिकाकर्ता को कई मौके देने के बाद भी काम शुरू नहीं होने पर नियमानुसार ठेका निरस्त किया गया है। इसके अलावा अब वहां 184 करोड़ रुपए के बजाए 83 करोड़ रुपए की लागत से फ्लाईओवर बनना है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने फ्लाईओवर बनाने के लिए जारी डीपीआर को रद्द कर पुराने अनुबंध के आधार पर प्रोजेक्ट पूरा करने को कहा है।

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