फर्जी बम धमकियों से थर्राया राजस्थान : 2 साल में 100 से ज्यादा धमकी ; एयरपोर्ट, विधानसभा और हाईकोर्ट बार-बार टारगेट
हाई-प्रोफाइल ठिकाने निशाने पर, लेकिन हर बार खाली हाथ
राजस्थान में बम धमाकों की फर्जी धमकियां अब छिटपुट शरारत नहीं, सुरक्षा तंत्र को थका देने वाला लगातार संकट। राजधानी जयपुर से लेकर पूरे राज्य तक पिछले दो वर्षों में 100 से ज्यादा बार ऐसी धमकियां।
जयपुर। राजस्थान में बम धमाकों की फर्जी धमकियां अब छिटपुट शरारत नहीं, सुरक्षा तंत्र को थका देने वाला लगातार संकट बन चुकी हैं। राजधानी जयपुर से लेकर पूरे राज्य तक पिछले दो वर्षों में 100 से ज्यादा बार ऐसी धमकियां मिल चुकी हैं। हर बार पुलिस, बम स्क्वाड, डॉग स्क्वाड और भारी सुरक्षा बल सक्रिय होते हैं, इमारतें खाली कराई जाती हैं, घंटों तलाशी चलती है, लेकिन अंत में नतीजा वही निकलता है। इन धमकियों का दायरा बेहद संवेदनशील रहा है। पुलिस मुख्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, सचिवालय, जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, विधानसभा, हाईकोर्ट, सेशन कोर्ट, कलेक्ट्रेट, पासपोर्ट कार्यालय और मिनी सचिवालय जैसे ठिकाने लगातार ई-मेल के जरिए निशाना बनाए गए।
सिर्फ जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट को पिछले दो साल में नौ बार उड़ाने की धमकी मिल चुकी है। जुलाई 2025 में सीएमओ और एयरपोर्ट को एक साथ धमकी मिली। अप्रैल 2026 में एक ही दिन विधानसभा, हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट को धमकी दी गई। मई 2025 में छह जिला कलेक्ट्रेट खाली कराने पड़े, जबकि मार्च 2026 में 12 शहरों के पासपोर्ट और पोस्ट ऑफिस एक साथ टारगेट किए गए। एक साल के भीतर ही 61 से ज्यादा धमकी भरे मेल मिलने से जयपुर पुलिस, एटीएस और साइबर सेल को बार-बार माथापच्ची करनी पड़ी।
धमकी का पैटर्न भी लगभग एक जैसा
हर धमकी का पैटर्न एक जैसा ही दिखता है। ई-मेल में लिखा होता है कि बिल्डिंग में आरडीएक्स लगाया गया है और 1-2 घंटे में विस्फोट होगा। कभी अजमल कसाब का नाम जोड़ा जाता है, कभी राजनीतिक संदेश। पुलिस हर बार मुकदमा दर्ज करती है, पर ज्यादातर मामलों में आरोपी पकड़े नहीं जाते।
अदृश्य नेटवर्क, डिजिटल मुखौटा
जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह अपराध दिखाई नहीं देता, सिर्फ डिजिटल निशान छोड़ता है। परिकल्पना यह है कि कोई स्पेक्टर जैसा काल्पनिक किरदार-30-35 साल का तकनीक जानने वाला, कई लैपटॉप, वीपीएन, टोर ब्राउजर, डार्क वेब अकाउंट्स और विदेशी आईपी का इस्तेमाल करने वाला-राज्य को बिना असली बम लगाए पंगु बना सकता है। वह जरूरी नहीं कि आतंकवादी ही हो; वह असफल, नाराज, बदले की भावना से भरा या सिर्फ अफरा-तफरी देखकर आनंद लेने वाला भी हो सकता है।
जांच में पहली मुश्किल है तकनीकी मास्क: धमकी देने वाले 7-8 लेयर वीपीएन, प्रॉक्सी सर्वर, फर्जी ई-मेल आईडी, इंटरनेट कॉलिंग, ईमेल स्पूफिंग और कभी-कभी डार्क वेब का इस्तेमाल करते हैं। साइबर सेल को अक्सर सिर्फ आखिरी नोड मिलता है, जो डेड-एंड साबित होता है। कई सर्वर दूसरे राज्यों या विदेशों से जुड़े मिलते हैं, जिससे जांच और जटिल हो जाती है।
दूसरी परत है मकसद: कुछ लोग डिसरप्शन फॉर फन के तहत पैनिक और मीडिया कवरेज चाहते हैं।
कुछ व्यक्तिगत बदले, नौकरी न मिलने, पुराने केस या सरकारी दफ्तरों से नाराजगी के कारण ऐसा कर सकते हैं। सबसे गंभीर आशंका यह है कि 3-4 लोगों का छोटा नेटवर्क शिफ्ट बदल-बदल कर पूरे राज्य को टारगेट कर रहा हो, ताकि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां लगातार व्यस्त रहें, संसाधन बर्बाद हों और जनता में भय का माहौल बने। इसका असर सिर्फ दहशत तक सीमित नहीं-फ्लाइट्स डिले होती हैं, कोर्ट-कचहरी ठप पड़ती है, सरकारी काम रुकते हैं और लाखों-करोड़ों का नुकसान होता है।
साइबर ट्रैकिंग को मजबूत करना होगा, फर्जी धमकी को सख्त दंडनीय अपराध की तरह लेना होगा और जनता को समझाना होगा कि यह मजाक नहीं, राज्य की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जनविश्वास पर हमला है।वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क एवं ॲनियन लेयरिंग होने के कारण अपराधी अपने आपको हाइड कर लेते हैं। उनका जैनुअन एड्रेस इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी के पास उपलब्ध नहीं हो पाता है और ना ही डेस्टिनेशन सर्वर के पास में उपलब्ध हो पाता है। इस कारण आरोपी पकड़ में नहीं आ पाते। -राकेश झाझड़िया, साइबर एक्सपर्ट

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