भारत के सबसे बड़े एजुकेशन फेस्टिवल ‘स्कून्यूज़ ग्लोबल एड फेस्ट’के 10वें संस्करण का आगाज, 500 से अधिक शिक्षक, प्राचार्य और स्कूल लीडर्स शामिल

पैरा क्रिकेटर आमिर हुसैन लोन द्वारा फ्रैंडली क्रिकेट मैच रखा खास

भारत के सबसे बड़े एजुकेशन फेस्टिवल ‘स्कून्यूज़ ग्लोबल एड फेस्ट’के 10वें संस्करण का आगाज, 500 से अधिक शिक्षक, प्राचार्य और स्कूल लीडर्स शामिल
स्कून्यूज ग्लोबल एड फेस्ट के उद्घाटन पर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने कहा कि देश के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी गुरुओं पर और शिक्षा को समावेशी बनाना समय की जरूरत। कार्यक्रम में ‘विलिंगनेस प्रोजेक्ट’ के तहत दिव्यांगजनों को कृत्रिम हाथ वितरित किए।
जयपुर। देश को आगे बढ़ाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारे गुरुओं के कंधों पर है। गुरु ही वह शक्ति हैं, जो आने वाली पीढ़ी को सही दिशा और बेहतर भविष्य का मार्ग दिखाते हैं। गुरु कोई काल्पनिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि हमारे जीवन को छूकर उसे नई दिशा देने वाले निर्माता हैं। आज का युग परिवर्तन का है। बदलता वही है जो स्वयं बदलने का साहस रखता है और वही कुछ कर दिखाता जिसके अंदर कुछ करने का दृढ़ संकल्प होता है। ज्ञान ऐसा अमूल्य धन है, जो बांटने से कभी कम नहीं होता, बल्कि निरंतर बढ़ता जाता है। यह बात उदयपुर के हाउस ऑफ मेवाड़ के श्रीजी डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने ‘स्कून्यूज़ ग्लोबल एड फेस्ट के 10वें संस्करण के उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्तव्य देते हुए कही। इस अवसर पर स्कून्यूज़ के संस्थापक और सीईओ, रवि संतलानी भी उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र के दौरान स्कून्यूज़ द्वारा सिम्बायोनिक के सहयोग से ‘विलिंगनेस प्रोजेक्ट का शुभारंभ किया गया। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत कार्यक्रम के दौरान दस ऊपरी अंगों से दिव्यांग लोगों को मंच पर अनुकूलित कृत्रिम हाथ प्रदान किए गए।
 
डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अपने संबोधन के दौरान अपने बचपन का प्रेरक किस्सा साझा करते हुए बताया कि वे डिस्लैक्सिक डायगनॉस हुए थे। जहां डॉक्टर्स ने उन्हें बौद्धिक रूप से अक्षम मान लिया था। इस विपरीत परिस्थिति के बावजूद किस प्रकार उन्होंने इसे अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया और अपनी पीएचडी तक शिक्षा को पूरा किया। यही नहीं, सामाजिक सेवा और जनकल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए अब तक उन्होंने 10 गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं। श्रीजी ने अपने संबोधन में आगे कहा कि 19वीं सदी ब्रिटेन की और 20वीं सदी अमेरिका की थी, लेकिन 21 वहीं सदी हिंदुस्तान की होगी। उन्होंने आगे सोशल मीडिया के बदलते दौर पर कहा कि जीवन की असली खूबसूरती सादगी और सरलता में बसी थी, जब सोशल मीडिया अस्तित्व में नहीं था। आज तकनीक हमारी जरूरत है, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल दुनिया हमारी संवेदनाओं, सादगी और मानवीय मूल्यों पर हावी न हो जाए।
 
होटल क्लार्क्स आमेर में आयोजित हो रहे इस फेस्ट का केंद्र एबल एजुकेशन समिट’ है, जिसकी थीम 'वन वर्ड.फोर लेटर्स. एवरीथिंग: नॉट डिसेबल्ड. नॉट डिफ्रैंटली एबल्ड. सिम्पली - एबल' विषय को उसके मूल स्वरूप में प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम में भारत और दुनिया भर से 500 से अधिक शिक्षक, प्राचार्य, स्कूल निदेशक, शिक्षाविद और विचारक शामिल हो रहे हैं। यह कार्यक्रम भारतीय स्कूलों से दिव्यांगजनों के लिए केवल सुविधाएं उपलब्ध कराने से आगे बढ़कर, शिक्षा व्यवस्था और कक्षाओं को शुरुआत से ही सभी के लिए समावेशी रूप में तैयार करने का आह्वान करेगा।
 
उद्घाटन सत्र के दौरान इंडिया इंक्लूजन फाउंडेशन के संस्थापक, फ़ेरोस वी. आर.ने वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया। जिसमें उन्होंने इंडिया इंक्लूजन फाउंडेशन के पीछे की प्रेरणा और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बदलाव लाने के लिए सिर्फ एक इन्क्लूजन समिट काफी नहीं है। हमारा मुख्य उद्देश्य लोगों की मानसिकता को बदलना है, जिससे इन्क्लूजन को अपनाते हुए वास्तविक बदलाव लाया जा सके।
 
फ्रेंडली क्रिकेट मैच ‘लेग्स, हार्ट एंड सिक्सेस’ रहा खास :
 
दिन का एक विशेष आकर्षण फ्रेंडली क्रिकेट मैच ‘लेग्स, हार्ट एंड सिक्सेस’ रहा। इस प्रेरणादायक मैच में कश्मीर के पैरा क्रिकेटर आमिर हुसैन लोन ने अपनी अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया। आमिर अपने पैरों की उंगलियों से गेंदबाजी करते हैं तथा कंधे और गर्दन की सहायता से बल्लेबाजी करते हैं। उनके साथ युवा दृष्टिबाधित क्रिकेटर प्रथमेश ने भी मैदान पर अपनी खेल प्रतिभा से सभी को प्रभावित किया। इस मैच ने दृढ़ इच्छाशक्ति, समावेशिता और खेल भावना का प्रेरक संदेश दिया।
 
पद्मश्री जावेद अहमद टाक द्वारा 'फ्रॉम बुलेट टू ब्लूप्रिंट’ सत्र :
 
फ्रॉम बुलेट टू ब्लूप्रिंट विषय पर अपने प्रेरक संबोधन में ज़ायबा आपा इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्क्लूजिव एजुकेशन, कश्मीर के संस्थापक, पद्मश्री जावेद अहमद टाक ने अपनी जीवन यात्रा साझा की। उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई सेवा नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है। हर बच्चे के अंदर असीम संभावनाओं की एक दुनिया होती है और उन संभावनाओं के द्वार खोलने की जिम्मेदारी समाज की है। उन्होंने कहा कि यदि हमें 100 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना है, तो ऐसे समावेशी विद्यालय और अनुकूल वातावरण तैयार करने होंगे, जहां हर बच्चा अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सके। अपने शिक्षक बनने के सफर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे स्वयं को "किंग्स चैयर" पर बैठा हुआ मानते हैं, क्योंकि उन्हें शिक्षा के माध्यम से लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और उनकी सेवा करने का अवसर मिला है।

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