महिला दिवस: बैंक बैलेंस से पहले हेल्थ बैलेंस जरूरी, असली महिला सशक्तिकरण की शुरुआत सेहत से होना जरूरी
सुपरवुमन बनने की होड़ में सेहत को न करें नजरअंदाज
महिला दिवस पर विशेषज्ञ डॉक्टरों ने आगाह किया है कि 60% महिलाएं देरी से जांच के कारण कैंसर की गंभीर स्थिति में पहुँच रही हैं। डॉ. अनुराधा और डॉ. निशा के अनुसार, नियमित चेकअप और पोषण को प्राथमिकता देना ही असली सशक्तिकरण है। दर्द सहना आभूषण नहीं, बल्कि बीमारी का संकेत हो सकता है; इसलिए स्वस्थ जीवन ही महिला की असली ताकत है।
जयपुर। महिला दिवस पर हम अक्सर नारी सशक्तिकरण, करियर ग्रोथ व फाइनेंशियल आजादी की बात तो बहुत करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत डराने वाली है। आज भी भारत में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं समय पर जांच न कराने के कारण ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के एडवांस स्टेज 3 व 4 में पहुंच जाती हैं। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत में कैंसर से होने वाली लगभग 70 प्रतिशत मौतें केवल बीमारी के देर से पता चलने और इलाज में हुई देरी के कारण होती हैं। सफलता और करियर पर साथ में ध्यान देते हुए महिलाओं को अपना हेल्थ बैलेंस भी सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
प्रिवेंटिव हेल्थ लग्जरी नहीं बेसिक जरूरत है
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराधा देवड़ा का कहना है कि हमारे समाज में हेल्थ को लेकर जानकारी की कमी नहीं है बल्कि कमी है तो उसे अमल में लाने की। महिलाएं परिवार की देखभाल में इतनी उलझ जाती हैं कि अपनी सेहत को हमेशा आखिरी प्राथमिकता देती हैं। संकोच के कारण वे अपनी तकलीफें छुपाती हैं और रूटीन चेकअप्स जैसे मैमोग्राफी या पैप स्मीयर तक को तब तक नजरअंदाज करती हैं, जब तक बीमारी लास्ट स्टेज पर न पहुंच जाए। डॉ. देवड़ा का कहना है कि समय पर बीमारी पकड़ में आने से सटीक और 100 प्रतिशत कारगर इलाज संभव हो जाता है।
सुपरवुमन बनने की होड़ में सेहत को इग्नोर करना खतरनाक
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. निशा मंगल इस बात पर जोर देती हैं कि महिलाओं का पोषण और उनका मानसिक स्वास्थ्य उनके सशक्तिकरण का असली आधार है। मेडिकल डेटा के अनुसार भारत में आज भी 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं खासकर ग्रामीण इलाकों में खून की कमी का शिकार हैं। वर्क-लाइफ बैलेंस और सुपरवुमन बनने की होड़ में महिलाएं अक्सर अपना खाना, नींद और मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा कर देती हैं एक स्ट्रॉन्ग, स्ट्रेस-फ्री दिमाग और हेल्दी शरीर ही एक एम्पॉवर्ड महिला की सबसे बड़ी ताकत है।
दर्द सहना नारी का आभूषण नहीं
वरिष्ठ स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. कल्पना तिवारी ने बताया कि कि हमारे समाज में महिलाओं के दर्द को बहुत आसानी से सामान्य बात मान लिया गया है। चाहे वह माहवारी के दौरान होने वाला असहनीय दर्द हो, लगातार रहने वाला कमर दर्द हो या शरीर का कोई भी अन्य दर्द। दुनिया भर में हर दस में से एक महिला एंडोमेट्रियोसिस जैसी बीमारी की शिकार है लेकिन जानकारी के अभाव में वे इसे माहवारी का सामान्य दर्द समझकर सालों तक नजरअंदाज करती हैं। इसी तरह शरीर का कोई भी पुराना और लगातार रहने वाला दर्द किसी बड़ी बीमारी जैसे अंडेदानी में गांठ या कैंसर, एडिनोमायोसिस, एंडोमेट्रियोसिस का शुरुआती संकेत हो सकता है। इसलिए सही समय पर इलाज करवाना और एक दद-मुक्त जीवन जीना ही आज के समय में महिलाओं का सबसे बड़ा और असली सशक्तिकरण है।

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