जनसंख्या और पर्यावरण में ट्रेड-ऑफ नीति बनाना जरूरी, 2060 तक 20 से 30 करोड़ बढ़ेगी जनसंख्या
जनसंख्या स्थिर होने की संभावना है
जनसंख्या बढ़ेगी तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरण प्रभावित होगा।
कोटा । जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच संतुलन आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, भारत की जनसंख्या आने वाले 30-40 वर्षों में लगभग 150 करोड़ से बढ़कर 170 करोड़ (1.5 अरब से 1.7 अरब) तक पहुँच सकती है, आने वाले 30-40 वर्षों में भारत की जनसंख्या में लगभग 20 से 30 करोड़ की वृद्धि होगी। यह वृद्धि तब हो रही है जब फर्टिलिटी रेट और प्रतिस्थापन दर, (रिप्लेसमेंट रेट) दोनों में गिरावट आ चुकी है। इसके बावजूद जनसंख्या का बढ़ना डेमोग्राफिक इनरशिया का परिणाम है, जिसके बाद जनसंख्या स्थिर होने की संभावना है। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेड-ऑफ अनिवार्य हो गया है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, मानवीय आवश्यकताएँ जैसे पानी, भोजन, ऊर्जा और आवास भी बढ़ेंगी, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इन संसाधनों की अत्यधिक खपत पर्यावरण पर दबाव डालती है। इसलिए, हमें यह तय करना होगा कि संसाधनों का उपयोग कितनी सीमा तक करें, ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जा सके। भविष्य में इंसान को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए कठोर ट्रेड-आॅफ करने होंगे।
ट्रेड-ऑफ कैसे करना होगा?
- जनसंख्या बढ़ने के साथ आवास की मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, लेकिन इस प्रक्रिया में वृक्षों की कटाई और भूमि का अत्यधिक उपयोग हो सकता है। इस समस्या का समाधान वर्टिकल कंस्ट्रक्शन और ग्रीन बिल्डिंग जैसे उपायों में है। इस तरह, कम जमीन में अधिक लोग समा सकते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है।
- बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक खाद्य उत्पादन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए अधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल किए जाएंगे। हालांकि, इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी की उर्वरता को कम कर सकता है और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इसका हल जैविक खेती औरड्रिप इरिगेशन और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट, जो भूमि और जल पर दबाव कम करने में मदद करते हैं।
- बढ़ती जनसंख्या के साथ जल और ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं। आबादी बढ़ने के साथ बिजली की माँग तेजी से बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए कोयले पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होगा।
सोलर एनर्जी को बढ़ावा देकर इस दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे कोयले का उपयोग पूरी तरह खत्म तो नहीं होगा, लेकिन प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव को संतुलित करते हुए ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ एक व्यावहारिक ट्रेड-ऑफ संभव होगा।
- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण प्रदूषण बढ़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिस्थितिकी तंत्र की हानि का कारण बनेगा। इस समस्या से निपटने के लिए हरित प्रौद्योगिकी और सतत कचरा प्रबंधन के उपायों को अपनाना आवश्यक होगा। कचरे का पुनर्चक्रण, कचरा पृथक्करण, और प्लास्टिक मुक्त समाज की दिशा में कदम बढ़ाने से प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
- जनवरों के संरक्षण के लिए ट्रेड-ऑफ करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन जरूरी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, शहरीकरण और खेती के लिए भूमि का उपयोग बढ़ेगा, जिससे जानवरों के आवास नष्ट होंगे। इसके लिए, सतत शहरीकरण और वन संरक्षण क्षेत्रों का विस्तार आवश्यक है। कृषि भूमि बढ़ाने से भी जानवरों को खतरा होता है, इसलिए जैविक खेती और स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियाँ अपनानी चाहिए, जो भूमि की उर्वरता और जानवरों के आवास दोनों को संरक्षित करें। साथ ही, जंगली जानवरों के लिए वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाए जाएं ताकि वे मानव बस्तियों से दूर रहें।
ट्रेड-ऑफ कहाँ तक कर सकते हैं?
जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव को ध्यान में रखते हुए, हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। वर्तमान में प्रदूषण और संसाधनों का संकट गहरा है, और बढ़ती जनसंख्या इसे और कठिन बना देगी। इसलिए, जनसंख्या नियंत्रण ही समाधान है। सरकार को स्पष्ट और सख्त ट्रेड-ऑफ पॉलिसी बनानी होगी, जो मानवीय आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तय करे। संसाधन सीमित हैं, और हमें ट्रेड-आॅफ तब तक करना होगा जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण और जैव विविधता को नष्ट न करें। इसके लिए तकनीकी नवाचार और हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाना जरूरी होगा, ताकि हम सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें। बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए क्या ट्रेड आॅफ करना पड़ेगा? इस विषय पर लोगों की राय को जाना।
तेजी से बढ़ती आबादी और विकास के नाम पर हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्य पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। आबादी बढ़ने के साथ जंगलों, वन भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन गहराता जा रहा है। आने वाले समय में 170 करोड़ की आबादी को खाद्य सुरक्षा देना एक बड़ी चुनौती होगी। जब 170 करोड़ होंगे तब पर्यावरण का सिर्फ शब्द ही बचेगा पर्यावरण नहीं बचेगा।निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट, बजरी, गिट्टी, बिटुमिन और खनिज पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। सड़क निर्माण, शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इसके साथ ही वन भूमि पर हो रहा अवैध खनन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि वैधानिक खनन के लिए नियम और मानक तय हैं, लेकिन अवैध खनन इन सभी नियमों को दरकिनार कर देता है। लीगल और इललीगल माइनिंग के बीच का अंतर पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। केवल ट्रेड-ऑफ नीति से समस्या का समाधान संभव नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की अपनी सीमाएं हैं।यदि सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते सख्त और प्रभावी निर्णय नहीं लिए, तो भविष्य में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।
-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद एवं वन्य जीव विशेषज्ञ
जल, जंगल और जमीन का संरक्षण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में, विशेष रूप से 2050 तक, यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। सस्टेनेबिलिटी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग करना कि वे हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहें। यदि वर्तमान में हम सस्टेनेबिलिटी को ध्यान में रखकर जल, जंगल और जमीन का उपयोग नहीं करेंगे, तो बढ़ती जनसंख्या के साथ प्राकृतिक संसाधनों में भारी गिरावट आएगी। डिजिटल एरा एक्सपोनेंशियली आगे ग्रोथ कर रहा है, जिससे तकनीक पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप ई-वेस्ट में वृद्धि हो रही है, जो पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सरकार को अभी से ट्रेड-ऑफ पॉलिसी लागू करनी होगी। साथ ही भावी पीढ़ियों को पानी, बिजली बचाने और अनावश्यक डिजिटल उपयोग से बचने की समझ देना अत्यंत आवश्यक है।
- प्रो. रीना दाधीच, कंप्यूटर विज्ञान विभाग, कोटा विश्वविद्यालय
जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अब हमें हर स्तर पर ट्रेड-ऑफ करना पड़ेगा। आज लोगों का व्यवहार ऐसा हो गया है कि वे यह सोचे बिना चीजें मंगाते जा रहे हैं कि वे वास्तव में आवश्यक हैं या नहीं। यदि हम जरूरत पर रुकना सीखें, तो यह उपभोग चक्र कहीं न कहीं धीमा हो सकता है। तकनीकी उत्पादों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, लेकिन अंतत: वे रीसायकल नहीं होते और कचरे में बदलकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग होने वाली वस्तुओं को अपनाना जरूरी है। नई-नई चीजें बार-बार मंगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि हम आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करें, तो ओवरऑल कंजम्पशन अधिक विचारशील होगा। इसके लिए हमें जीवन की गति को थोड़ा धीमा करना होगा और अपनी वास्तविक जरूरतों को समझना पड़ेगा।
-डॉ. रचना पटेल,आई सर्जन, राजस्थान आई हॉस्पिटल
पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए लोगों को अपनी आदतों में परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है। आज लोग घरों के सामने, नालियों में कूड़ा डालते हैं और सड़कों पर चारा फेंकते हैं। जंगलों की कटाई लगातार बढ़ रही है और पहाड़ों को बचाना भी जरूरी हो गया है। भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का संरक्षण करना हम सभी की जिम्मेदारी है। पानी, बिजली और जंगलों का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। वायु प्रदूषण के कारण बीमारियाँ बढ़ रही हैं और औद्योगिक प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है। कई उद्योग जहरीली गैसें हवा में छोड़ रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उद्योगों का कचरा नदियों और नालों में मिलाया जा रहा है, जिससे तालाब और नदियाँ गंदी हो रही हैं। औद्योगिक अपशिष्ट जल का रीसायकल होना चाहिए। पौधारोपण केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि पौधों को बचाना जरूरी है। प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बंद होना चाहिए। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन बेहद आवश्यक है।
- डॉ. सुषमा आहूजा,लायंस इंटरनेशनल, संभागीय अध्यक्ष
संसाधान सीमित है ऐसे में ट्रेड ऑफ करना पड़ेगा। साथ ही बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण भी जरूरी होगा। सरकार को सीमित संसाधनों को बढ़ाने के लिए भी प्रयास करना होगा। संसाधनों का पुनर्चक्रण और संरक्षण करने पर भी जोर देना होगा। बढ़ती जनसंख्या के बावजूद अगर संसाधनों का समझदारी से उपयोग किया जाए तो पर्यावरण पर कम दबाव पड़ेगा।
-सचिन मंगल, सीए
जनसंख्या पर नियंत्रण करना अब अनिवार्य हो गया है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं, इसलिए वनों की कटाई को रोकने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव भविष्य को चुनौतीपूर्ण बना रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्ष और अधिक कठिन होंगे। जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन जैसी सख्त और प्रभावी नीति लाने की आवश्यकता है, जिससे जनता जागरूक हो और इस विषय की गंभीरता को समझ सके। ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जो समाज को जिम्मेदारी का एहसास कराए और संतुलित विकास को बढ़ावा दे। तभी हम पर्यावरण, संसाधनों और भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रख पाएंगे।
- लोकेश शर्मा, बिजनैसमैन

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