मेले में 30 साल पुरानी रेट पर चल रहे झूले

इस बार मेले में झूलों की संख्या दो गुनी होने से बहुत कम राशि में मिल रहा झूलों का आनंद

मेले में 30 साल पुरानी रेट पर चल रहे झूले

बड़े झूलों के टिकट भी 20,30 और 50 रुपए।

कोटा। नगर निगम की ओर से आयोजित 131 वां राष्ट्रीय दशहरा मेला धीरे-धीरे अंतिम पायदान पर पहुंच रहा है। तीन दिन बाद मेले का समापन होने वाला है। लेकिन इस बार मेले में बड़े से बड़े झूले भी 20,30 व 50 रुपए तक के टिकट में चल रहे है। जिससे लोगों को तो कम टिकट में झूलों का आनंद मिल रहा है। लेकिन झूलों की संख्या इस बार दो गुनी होने से संचालकों का खर्चा तक नहीं निकल रहा।  दशहरा मेले की शुरुआत वैसे तो 3 अक्टूबर को नवरात्र स्थापना के साथ हो गई थी। लेकिन पृरा मेला दशहरे के दिन 12 अक्टूबर से ही परवान  चढ़ा। हालांकि मेला शुरू होने से पहले दुकानदाररों की तुलना में इस बार झूले कई दिन पहले से लगना शुरू हो गए थे। उद्घाटन के दिन तक ही अधिकतर झूले लग चुके थे। लेकिन मेले में लोगों के नहीं जाने से वे खाली रहे।दशहरे के दिन से झृूलों पर भीड़ पड़ने लगी। 

मेला समिति ने तय की रेट, मार्केट उससे भी कम
मेले में आने वाले लोगों में से अधिकतर लोग झूला झृलते है। बच्चों से लेकर महिलाएं तक और परिवार के लोग एक साथ झूलों का आनंद लेते है। हर बार मेले में झृलों पर अधिक भीड़ रहने से लोगों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था और झूलों का टिकट भीकाफी अधिक रहता  था। ऐसे में मेला समिति द्वारा इस बार झूलों की संख्या पहले से अधिक रखी गई। साथ ही पूरे दशहरा मैदान में झृूले लगवाए। जिससे हर तरफ लोगों को सुविधा मिल सकेऔर भीड़ का सामना नहीं करना पड़े। वहीं मेला समिति ने लोगों को राहत देने के लिए झूला संचालकों के साथ बैठक कर शुरुआत में छोटे और बड़े झूलों के टिकट की राशि तय कर दीथी। जिसमें उनसे कहा था कि वे इससे अधिक राशि नहीं वसूल करेंगे। शुरुआत में कुछ दिन तक तो मेला समिति वाली राशि में झूलों का संचालन हुआ। लेकिन झूलों की संख्या अधिक होने से लोग बंट गए तो झृूलों पर लोगों की भीड़ कम रहने लगी। ऐसे में अधिकतर झूले कम लोगों के साथ या खाली चलने लगे। जिससे झूला संचालकों को मजबूरी में टिकट की राशि कम करनी पड़ी। 

तीस साल पहले थी इतनी रेट
झूला संचालक जाकिर हुसैन ने बताया कि मेला समिति का प्रयास अच्छा था। लेकिन हालत यह हैकि इस बार झृलों की संख्या पिछले सालों की तुलना में करीब दो गुना हो गई है। पहले जहां छोटे-बड़े करीब 30 से 31 झृले आते थे। वहीं इस बार झूलों की संख्या 60 से अधिकहै। पूरे मेले में झूले ही झूले नजर आ रहे है। जहां पहले दुकानें लगती थी वहां भी झूले लगवा दिए। उन्होंने बताया कि ग्राहक नहीं आने पर झूला संचालकों को नुकसान होने लगा। मजबूरी में टिकट की राशि 50 व 80 रुपए से घटाकर बड़े से बड़े झूले की 20,30 व 50 रुपए तक करनी पड़ी।उसके बाद भी लोग कम आने से सभी झूला संचालकों को नुकसान हो रहा है। अब तो यह स्थिति है कि नुकसान तो होना ही है उसे जितना कम किया जा सकता है वह किया जा रहा है। 

खर्चा निकलना तक मुश्किल
झृला संचालकों का कहना है कि झृलों के लिए जगह लेने, ट्रांसपोर्टेशन, फिटिंग, डीजल, लाइट व अन्य सभीखर्चे काफीअधिक हो रहेहै।उनकी तुलना में कमाई कुछ भीनहीं हो रहीहै। ऐसे में अभीतक जितना खर्चा हुआ है वह भी निकलना मुश्किल हो रहा है कमाई करना तो दूर। झूला संचालकों का कहना है कि दशहरा मेला राष्ट्रीय स्तर का है।इसमें वर्तमान में झूलों की रेट है वह पिछले तीस साल पुरानीहै। 1994-95  में इस रेट में झूले चलते थे। पिछले साल भी  बड़े झूले 100 रुपए सेकम में नहीं चलेथे। लेकिन अभी तो चकरी वाले छोटे झृूलों की रेट में बड़े-बड़े झूले चलाने पड़ रहे है। जानकारों के अनुसार एक दो झृले ऐसे हैं जो इस बार नए है। उनकी रेट 100 से 150 रुपए होने के बावजूद उन पर भीड़ अधिक है। जबकि अधिकतर पर  बहुत कम लोग झूल रहेहै। 

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इतनी कम रेट, विश्वास नहीं हो रहा
इधर मेला झृमने आए लोग जब झृूलों के तरफ गए तो वहां उनके टिकट की रेट सुनकर ही दंग रह गए। पाटनपोल निवासी निधि शर्मा ने बताया कि मेले में हमेशा बड़े झूले 80 से 100 रुपए में झूलते रहे हैं। पहली बार इतनीकम रेट देखकर विश्वास नहीं हो रहा। झूलों की रेटहर बार अधिक होने से इस बार झूला झृलने का मन नहीं था। लेकिन यहां आकर देखा तो मन हो गया। पहले जिस रेट में एक या दो ही झूले झूल पातेथे। इस बार उसी रेट में अधिक झूलों का आनंद ले लिया। रंगबाड़ी निवासी सुनील त्रिपाठी ने बताया कि मेले में घृूमने आए थे। झूलों का किराया कम होने से  परिवार के सभी लोगों को अधिकतर झूले झुलवा दिए। इस बार ही रेट कम है। जबकि हमेशा इनका किराया अधिक रहता है। उसके बाद भी भीड़ होने से काफीदेर तक इंतजार करना पड़ता था। इस बार आसान से झूला झूल पाए। 

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लोगों को राहत देने का प्रयास
इधर मेला समिति अध्यक्ष विवेक राजवंशी का कहना है कि मेले में  रोजाना आने वाले हजारों लोगों को राहत देने के लिए इस बार झूलों की संख्या बढ़ाई गई थी।साथ ही झूलासंचालकों को एक निर्धारित राशि ही लेने के लिएपाबंद किया गया था। जिससे अधिक सेअधिक लोग झूलों का आनंद लेसकेऔर वह भीबिना परेशानी व इंतजार के। जिससे उनका समय भी खराब नहीं हो। वरना अक्सर झूलों के कई शौकीन लोग या तो झृलों में ही पूरा समय लगा देते थे।या समय अधिक लगने से  चाहकर भी सभी झूलों का आनंद नहीं ले पाते थे। रेट कम होने से लोगों को फायदा हो रहाहै। 

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