पिता की बूढ़ी आखों में आई चमक आंसुओं में बह गई

न भविष्य की उम्मीद है, न अतीत की कमाई

पिता की बूढ़ी आखों में आई चमक आंसुओं में बह गई

चार अप्रैल को कोर्ट के फैसले ने छीनी नौकरी, 5 अप्रैल की परीक्षा में बैठने लायक भी नहीं छोड़ा सिस्टम ने।

कोटा। बहन पायल गोयल जूनियर असिस्टेंट और निकिता अपने भाई के इस हालात पर निःशब्द हैं। पिता की बूढ़ी आंखों में आई चमक आंसुओं में बह गयी माँ ने तो अपने लाडले को गले से लगा बस इतना ही कहा बैटा शरीर कमजोर कर लिया। छुटकी ने तो कह ही दिया दादा आप तो बोलते थे पढ़ो नौकरी मिलेगी । एसआई भर्ती परीक्षा 2021 का पुल पार कर नौकरी पर चढे. राहुल अपने अतीत के दिनों में खुद का वजूद ढूंढने लगते है। राहुल को एसआई के रूप में बून्दी जिले में नियुक्ित मिली थी। 6 जनवरी 2025 में पद लिया लेकिन सिस्टम ने सालों पीछे धकेल दिया है। राहुल कहते हैं क्या मेरे जीवन के ये गुजरे साल और मंजिल पाने के बाद बदनामी के अंधेरों में से मैं अपने को लौटा पाऊंगा।
बोरखेड़ा निवासी राहुल गोयल के लिए अप्रैल का यह हफ्ता किसी बुरे सपने सा साबित हुआ। राहुल बताते है कि नयी भर्ती के पेपर से एक दिन पहले 4 अप्रैल को आए हाई कोर्ट के फैसले ने न केवल उनके कंधे से 'सब-इंस्पेक्टर' के सितारे छीन लिए, बल्कि भर्ती परीक्षा के एक दिन पहले तक असमंजस के चलते इसकी तैयारी के दरवाजे भी उनके लिए बंद कर दिए।

स्टेनो की नौकरी और 14 किलो वजन का त्याग
पिता निरंजन गोयल और माता अनीता देवी के लाडले राहुल ने 2018 से किताबों को अपना संसार बनाया था। 2021 में स्टेनोग्राफर की पक्की नौकरी मिली, 200 में से 174 नम्बर लाने के बाद टाईपिंग टेस्ट की परीक्षा के बाद नौकरी पक्की थी। लेकिन वर्दी का जुनून ऐसा था कि उसे ठुकरा दिया।
एसआई की परीक्षा में कुल 315 नम्बर के बाद से ही 86 किलो वजन के साथ फिजिकल की तैयारी में जुट गया। लोग ताने मारते थे लेकिन नयापुरा स्टेडियम की तपस्या ने 4 महीने में 14 किलो वजन कमकर राहुल को एक फौलादी एथलीट बना दिया। 100 में से 65 नंबर फिजिकल में लाकर राहुल ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया था।

साथी की आत्महत्या ने झकझोर दिया
5 अक्टूबर 2023 को जॉइनिंग के बाद राहुल ट्रेनिंग के कड़े अनुशासन में ढल चुके थे। सुबह 5 से रात 8 बजे तक की ट्रेनिंग ने उन्हें बाहरी दुनिया और नई पढ़ाई से पूरी तरह काट दिया था। बून्दी 6 जनवरी 2025 में पद लिया । राहुल बताते हैं,आरपीऐ में ट्रेनिंग के साथी राजेन्द्र की आत्महत्या ने झकझोर के रख दिया था, लेकिन हमें नेचुरल जस्टिस पर यकीन था। हमें क्या पता था कि जिस सिस्टम के लिए हम पसीना बहा रहे हैं, वही हमें एक दिन अनाथ छोड़ देगा।

4 अप्रैल के फैसले से अगली परीक्षा का मौका भी छिन गया
राहुल बताते है कि जीवन में सबसे बड़ा वज्रपात 4 अप्रैल को हुआ। हाई कोर्ट के फैसले से नौकरी गई,लेकिन अगले ही दिन पेपर तो था पर हम उसमें कही नहीं थे। हम तो नौकरी पा चुके थे तो फार्म भी क्यू भरते। ट्रेनिंग ने उन्हें 2 साल तक किताबों से दूर रखा,उन्हें इस स्थिति में भी नहीं छोड़ा कि वे फैसले के 24 घंटे के भीतर होने वाली नई परीक्षा भी दे सकें। 8 साल खपाने के बाद आज हमारे पास न भविष्य की उम्मीद है, न अतीत की कमाई। न शरीर में वह फुर्ती है कि नए युवाओं से दौड़ सकें, न मन में वह हौसला कि फिर से शून्य से शुरुआत करें।
राहुल आज एक चलते-फिरते सवाल बन गए हैं। वे पूछते हैं कि उनकी क्या गलती थी? मैने पूरी ईमानदारी से परीक्षा दी, फिजिकल पास किया, इंटरव्यू की बाधा पार की और ट्रेनिंग की। आज जब वे सिस्टम से बाहर हैं, तो उनके पास न भविष्य की उम्मीद है, न अतीत की कमाई। 

Read More असर खबर का : नए रंग में नजर आने लगी एमबीएस इमरजेन्सी की ट्रालियां, कांच के कमरे से निकलकर मरीजों की सेवा में पहुंची

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