मिडिल ईस्ट में युद्ध : परिंदे भी हुए बेघर, दूसरे देशों में ढूंढ रहे बसेरा, सर्दियों में हर साल मध्य एशिया और सेंट्रल यूरोप से कोटा आते हैं पक्षी
गर्मी की तपिश बढ़ने के साथ ही अपने वतन लौटने लगे विदेशी परिंदे
इजरायल- ईरान युद्ध के कारण बदलना पड़ रहा पारंपरिक मार्ग।
कोटा। सर्दियों में कोटा के जलाशयों की रौनक बढ़ाने वाले विदेशी मेहमान परिंदों की घर वापसी का सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन इस बार मिडिल ईस्ट में युद्ध के चलते वह भी अपने मूल निवास पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। बमबारी, धुआं और बढ़ते तापमान के कारण कुछ पक्षियों ने अपने पारंपरिक मार्ग बदल दिए हैं। कई पक्षी खाड़ी देशों की ओर जाने के बजाय सेंट्रल यूरोप और एशिया के ठंडे इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। फिर भी हर साल की तरह इस बार भी अप्रैल तक कोटा के जलाशय इन मेहमान परिंदों से खाली हो जाएंगे।दो दर्जन से अधिक प्रजातियों के ये पक्षी हर साल कोटा जिले के जलाशयों में चार से पांच महीने तक प्रवास करते हैं और यहां के मौसम व भोजन के अनुकूल वातावरण में रहते हैं। मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत से इन पक्षियों की वापसी तेज हो जाती है। इस समय जलाशयों से पक्षियों के बड़े-बड़े झुंड उड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। अप्रैल तक मेहमान व मेजबान पक्षी एक बार फिर बिछुड़ जाएंगे।
इजरायल- ईरान युद्ध के कारण बदलना पड़ रहा बसेरा
नेचर प्रोमोटर ए.एच. जैदी ने बताया कि इस बार अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भी पक्षियों के प्रवास पर देखने को मिल रहा है। कई पक्षी खाड़ी देशों की ओर जाने के बजाय सेंट्रल यूरोप और एशिया के ठंडे इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मध्य एशिया में युद्ध के कारण कुछ पक्षियों का समूह भारत, चाइना, रूस सहित कई देशों के ठंडे इलाकों की रुख भी कर रहे हैं। युद्ध में हो रही बमबारी के कारण वायुमंडल में धुआं, आगजनी से तापमान की अधिकता के कारण पक्षी खाड़ी देशों की ओर रुख करने के बजाय अपना मार्ग बदल रहे हैं। हाल ही में कई जलाशयों पर इनकी संख्या कम होती दिखाई दे रही है।
इटली से जर्मनी तक इन देशों से आते हैं परिंदे
उन्होंने बताया कि कोटा जिले में मध्य यूरोप, फ्रांस, जर्मनी, इटाली, इंग्लैंड, मंगोलिया, ईरान, साइबेरिया, रूस, चाइना, तिब्बत, नेपाल, हिमालय, भारत के लडाख समेत अन्य उंडे प्रदेशों से पक्षी आते हैं। विदेशी पक्षी कोटा के जिन तालाबों में आना पसंद करते हैं, उनमें दरा अभयारणय का किशोर सागर, गोपाल विहार, गिरधरपुरा, उदपुरिया, उम्मेदगंज पक्षी विहार, आलनिया, रानपुर, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, जवाहर बाई का तालाब, गैपरनाथ, गरड़िया महादेव, भैंसरोडगढ़ सहित कई वेटलैंड शामिल है।
5 महीने परिंदों चहचहाट से गुलजार रहते हैं वेटलैंड
उन्होंने बताया कि देश-प्रदेश से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी हाड़ौती के जंगलों की ओर रुख करते हैं। इनमें से नॉर्दन शावलर, नॉर्दन पिनटेल, इरोशियन विजन, गेडवेल, कॉमन टिल, कॉटन टिल, कॉमन पोचाई, रेड करस्टेड पोचाई, टफ टेड वाइट आई पोचार्ड, बार हैडेड मूज, रूडी शेल्डक, कॉमन फूट, कॉम डक समेत कई प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं। इनकी चहचहाट ये शिक्षा नगरी की फिजा गुलजार रहती है। इन्हें देखने के लिए बर्ड्स वॉचर की भीड़ लगी रहती है।
मिस्त्र का राष्ट्रीय पक्षी भी पहुंचा अपने मुल्क
पक्षी प्रेमी शेख जुनैद ने बताया कि कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन से हजारों किमी का सफर तय शिक्षा नगरी में आए मिस्त्र के राष्ट्रीय पक्षी स्टेपी ईगल भी अपने मुल्क की ओर कुच कर गए। हालांकि, कई जगहों पर इनकी संख्या बहुत कम नजर आ रही है। यह भी अप्रैल के अंत तक लौट जाएंगे। स्टेपी ईगल बाज प्रजाति का शिकारी पक्षी है, जो हवा में काफी उंगाई पर उड़ते हुए खरगोश, चूहे का शिकार करता है। स्टेपी ईगल मिस्त्र का राष्ट्रीय पक्षी है और कजाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में इसका चित्र है। नवम्बर से इनका आना शुरू हो जाता है और मार्च-अप्रैल तक राहते हैं। यह मुख्य रूप से घास के मैदानों व खुले जंगलों में रहना पसंद करते हैं।
अब फिर से अक्टूबर में होगी मुलाकात
पक्षी प्रेमी देवेंद्र नागर ने बताया नील कंठी पक्षियों का सितम्बर से आना शुरू हो जाता है। मार्च-अप्रैल तक वापस लौटने लगते हैं। यह नदी, तालाब, खेतों व दलदली जगहों पर अपना ठिकाना बनाते हैं। वर्तमान में अभेड़ा, आलनिया डेम, उम्मेदगंज, उदपुरिया व बरधा बांध के आसपास इनकी आवाजाही रहती है। यह कीड़े-मकोड़ों को भोजन बनाते हैं। ये पक्षी एक दिन में 80 से 100 किमी की उड़ान भरते हैं। अब फिर से सितम्बर में इनसे मुलाकात होगी।

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