ग्रीनलैंड के पास फ्रांस ने भेजा राफेल से लैस परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर, जबरन कब्जे की तैयारी में डोनाल्ड ट्रंप

ग्रीनलैंड पर यूरोप की एकजुटता, फ्रांस का शक्ति प्रदर्शन

ग्रीनलैंड के पास फ्रांस ने भेजा राफेल से लैस परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर, जबरन कब्जे की तैयारी में डोनाल्ड ट्रंप

ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय एकजुटता दिखाते हुए फ्रांस ने परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर चार्ल्स डी गाले को उत्तरी अटलांटिक की ओर तैनात किया, यूरोपीय संप्रभुता को समर्थन जताया और अमेरिका संदेश

पेरिस। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप के देश एकजुट होते दिख रहे हैं। अमेरिका को खुली चेतावनी देने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने ग्रीनलैंड के पास उत्तरी अटलांटिक महासागर में अपने एकमात्र परमाणु ऊर्जा से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर चार्ल्स डी गाले को भेजा है। यह राफेल फाइटर जेट से लैस है। फ्रांस के रक्षा मंत्रालय ने इस तैनाती के बारे में ऐलान किया है। माना जा रहा है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी सेना के हमले के खतरे को देखते हुए फ्रांसीसी नौसेना ऐक्शन में आई है। यही नहीं फ्रांसीसी राष्ट्रपति डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं से पेरिस में मिलने जा रहे हैं। फ्रांसीसी राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा है कि मैक्रों यूरोपीय एकजुटता को एक बार फिर से अपना समर्थन जाहिर करेंगे। साथ ही डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता और क्षेत्रीय एकजुटता को भी अपना समर्थन देंगे।

फ्रांसीसी स्ट्राइक कैरियर कहां जा रहा?

फ्रांस, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेता आर्कटिक में सुरक्षा खतरे, ग्रीनलैंड के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के मुद्दों पर चर्चा करेंगे। इसको फ्रांस और यूरोपीय संघ दोनों ही सपोर्ट करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, फ्रांसीसी रक्षा मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि चार्ल्स डी गॉल को कहां तैनात किया जा रहा है, लेकिन समाचार एजेंसी के सूत्रों के हवाले से बताया कि यह उत्तरी अटलांटिक की ओर बढ़ रहा है। हाल के दिनों में यह इलाका अमेरिका और यूरोप के बीच भूराजनीतिक तनाव का केंद्र बनकर उभरा है। फ्रांस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि नेवल एयर ग्रुप ओरियन 26 सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए तोउलोन नौसैनिक अड्डे से रवाना हो गया है। 

स्ट्राइक कैरियर के साथ पूरा बेड़ा

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फ्रांस के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप में चार्ल्स डी गॉल और उसके विमान, साथ ही कई एस्कॉर्ट और सपोर्ट जहाज शामिल हैं। इसमें एक डिफेंस फ्रिगेट, एक सप्लाई शिप और एक हमलावर पनडुब्बी है। यह अभ्यास ऐसे समय में होने जा रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्तशासी क्षेत्र ग्रीनलैंड को लगातार अमेरिका में मिलाने की धमकी दे रहे हैं।

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए कमर कस चुके हैं। अमेरिका की सेना इसके लिए लगातार तैयारी भी कर रही है। ट्रंप के इस रुख से 32 देशों की सदस्यता वाले सैन्य संगठन उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानि नाटो के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। ट्रंप की दादागिरी के खिलाफ यूरोपीय देश एकजुट हो रहे हैं। ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे ताकतवर यूरोपीय देशों ने अमेरिका को ग्रीनलैंड को लेकर चेतावनी भी दी है। 

इस बीच नाटो चीफ ने चेतावनी दी है कि बिना अमेरिका के नाटो देश अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं। ग्रीनलैंड का प्रशासन डेनमार्क देखता है जो नाटो का सदस्य देश है। ट्रंप ने कहा है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत ही जरूरी है। दरअसल, अमेरिका यहां पर अपना गोल्डन डोम डिफेंस सिस्टम लगाना चाहता है ताकि रूस और चीन की मिसाइलों से अमेरिका को बचाया जा सके। 

डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो को दी टैरिफ की धमकी

यही नहीं डोनाल्ड ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर भारी भरकम टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं। नाटो का आर्टिकल 5 कहता है कि अगर एक सदस्य देश पर दुश्मन का हमला होता है तो यह सभी देशों पर अटैक माना जाएगा। यही नहीं इस जंग में नाटो के हर सदस्य देश को सैन्य सहायता देना होगा। 

नाटो के महासचिव जनरल मार्क रट ने सोमवार को खुलासा किया कि अमेरिकी सैन्य सहायता के बिना यूरोप अपनी खुद की रक्षा नहीं कर सकता है। उन्होंने यूरोपीय सांसदों से कहा कि यूरोप और अमेरिका को एक-दूसरे की जरूरत है।

जर्मनी-पोलैंड बनाना चाहेंगे परमाणु बम

एक्सपर्ट के अनुसार अमेरिका ठीक इसी समय यूरोप को अपने ऊपर निर्भर बनाए रखेगा और उसे एक विरोधी ब्लॉक के रूप में उभरने से रोकेगा। उन्होंने कहा कि ट्रंप के शासनकाल में नाटो के आंतरिक नियम बदलने जा रहे हैं। अगर अमेरिका नाटो से निकलता है तो यूरोपीय सुरक्षा ढांचा खंड-खंड हो जाएगा। 

यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा की जगह पर अपनी-अपनी सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित कर देंगे। उन्होंने कहा कि जर्मनी और पोलैंड जैसे यूरोपीय देश परमाणु बम हासिल करने पर बहस करने लगेंगे। वहीं ब्रिटेन और फ्रांस असलियत में अमेरिका की कमी को पूरा नहीं कर पाएंगे। ये दोनों देश पूरे यूरोप की उस तरह से सुरक्षा नहीं कर पाएंगे जैसे कि अमेरिका करता है।

अमेरिकी सेना का ग्रीनलैंड में बेस

जैसे-जैसे वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, यह द्वीप भू-राजनीतिक दबाव का एक मापक बन गया है। इससे पता चलता है कि पुरानी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था किस तरह कमजोर पड़ने लगी है। इन सभी के केंद्र में पिटुफिक अंतरिक्ष ठिकाना है, जिसे पहले थुले एयरबेस के नाम से जाना जाता था। शीतयुद्ध के दौरान एक चौकी के रूप में इस्तेमाल यह बेस अब अमेरिकी सेना के अंतरिक्ष बल केंद्र का एक अहम हिस्सा है, जो मिसाइल का पता लगाने से लेकर जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने तक हर चीज के लिए आवश्यक है। ग्रीनलैंड में अमेरिकी रुचि उस समय बढ़ रही है, जब युद्ध के बाद की नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था शांति और सुरक्षा बनाए रखने में तेजी से निष्प्रभावी साबित हो रही है।

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