UNIGE के शोधकर्ताओं ने विकसित किया एक स्मार्ट सिस्टम : कैंसर कोशिकाओं की सटीक तरीके से कर सकती है पहचान, दवाओं को केवल जरूरत वाले स्थान पर ही करती है रिलीज
यह शोध पत्र Nature Biotechnology में प्रकाशित हुआ
जिनेवा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सिंथेटिक डीएनए आधारित स्मार्ट सिस्टम विकसित किया है, जो दो कैंसर मार्कर्स की मौजूदगी पर दवा सक्रिय करता है। 'टू-की' तकनीक से यह केवल ट्यूमर कोशिकाओं को पहचानकर दवा पहुंचाती है, जबकि स्वस्थ ऊतकों को सुरक्षित रखती है। यह टारगेटेड, प्रोग्रामेबल और बहुदवा उपचार का भविष्य माना जा रहा है। क्लिनिकल उपयोग की उम्मीद बढ़ी
जिनेवा। वैज्ञानिक लंबे समय से इस चुनौती का सामना कर रहे हैं कि कैंसर कोशिकाओं को बिना स्वस्थ ऊतकों को नुकसान पहुंचाए कैसे नष्ट किया जाए। इस दिशा में जिनेवा विश्वविद्यालय (UNIGE) के शोधकर्ताओं ने एक “स्मार्ट” सिस्टम विकसित किया है, जो सिंथेटिक डीएनए स्ट्रैंड्स पर आधारित है। यह प्रणाली कैंसर कोशिकाओं की पहचान बेहद सटीक तरीके से कर सकती है और दवाओं को केवल जरूरत वाले स्थान पर ही रिलीज करती है। यह शोध पत्र Nature Biotechnology में प्रकाशित हुआ है।
टारगेटेड थेरेपी ने कैंसर उपचार में पहले ही बदलाव ला दिया है, जिसमें दवाओं को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाया जाता है, ताकि स्वस्थ कोशिकाओं को कम नुकसान हो। एंटीबॉडी-ड्रग कंजुगेट्स (ADCs) इसी दिशा में एक सफल तकनीक है, लेकिन इनके आकार और सीमित दवा वहन क्षमता जैसी कुछ सीमाएं हैं। इन चुनौतियों को दूर करने के लिए UNIGE टीम ने छोटे डीएनए स्ट्रैंड्स पर आधारित सिस्टम विकसित किया है। ये अणु छोटे होने के कारण ट्यूमर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और एक साथ कई घटकों को वहन कर सकते हैं।
यह नई तकनीक “टू-की” सिस्टम पर काम करती है, जिसमें दो अलग-अलग कैंसर मार्कर्स की मौजूदगी जरूरी होती है। जब दोनों मार्कर्स मिलते हैं, तो डीएनए घटक आपस में जुड़कर दवा को सक्रिय करते हैं। यदि एक भी मार्कर अनुपस्थित हो, तो प्रक्रिया शुरू नहीं होती, जिससे स्वस्थ कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस प्रणाली ने कैंसर कोशिकाओं को सफलतापूर्वक पहचानकर उन तक दवा पहुंचाई, जबकि आसपास की स्वस्थ कोशिकाएं प्रभावित नहीं हुईं। साथ ही, एक से अधिक दवाओं को एक साथ देने की क्षमता भी दिखाई गई, जो उपचार में दवा प्रतिरोध जैसी समस्याओं को कम कर सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक भविष्य की “प्रोग्रामेबल” और स्व-प्रतिक्रियाशील दवाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जहां दवा स्वयं जैविक संकेतों के आधार पर निर्णय ले सकेगी।

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