पूर्वी राजस्थान का हो सकेगा कायापलट

पूर्वी राजस्थान का हो सकेगा कायापलट

परियोजना के जरिए मध्य प्रदेश और राजस्थान में पांच लाख अस्सी हजार हेक्टेयर असिंचित भूमि पर सिंचाई सुविधा बढ़ सकेगी और करोड़ों लोगों को पेयजल की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।

पूर्वी राजस्थान का भाग्य सवारने वाली बहुप्रतीक्षित पार्वती-कालीसिंध-चंबल ईस्टर्न राजस्थान कैनाल लिंक प्रोजेक्ट (पीकेसी-ईआरसीपी) पर राजस्थान, मध्यप्रदेश और केन्द्र सरकार के बीच समझौता हो गया है। इस समझौते को दोनों राज्यों के 26 जिलों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए स्वर्णिम सूर्योदय का दिन कहा जा रहा है। परियोजना के जरिए मध्य प्रदेश और राजस्थान में पांच लाख अस्सी हजार हेक्टेयर असिंचित भूमि पर सिंचाई सुविधा बढ़ सकेगी और करोड़ों लोगों को पेयजल की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। पीकेसी के ईआरसीपी के साथ एकीकृत करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव के अनुमोदन के बाद राजस्थान और मध्यप्रदेश के बीच जल बंटवारे को लेकर दो दशकों से चल रहा विवाद खत्म हो गया। अब विवाद के समाप्त होने के साथ ही ईआरसीपी राजस्थान की अब तक की सबसे बड़ी नहर परियोजना बन गई है।

ईआरसीपी की डीपीआर ( डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिर्पोट ) 2017 में वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में बनी थी। इसके बाद 2018 में राजस्थान में सरकार बदल गई और परियोजना दलगत राजनीति का शिकार हो गई। कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार चाहती थी कि केन्द्र सरकार ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करे, जिससे प्रोजेक्ट पर होने वाले खर्च का 90 प्रतिशत खर्चा केन्द्र सरकार को वहन करना पड़े और राज्य पर मात्र 10 फीसदी खर्च का ही भार पड़े। नीति आयोग की 7वीं बैठक में भी मुख्यमंत्री गहलोत ने इस मुद्दे को उठाया और कहा कि भाजपा इस मामले में राजनीति कर रही है। इस संबंध में गहलोत ने केन्द्र सरकार और जल शक्ति मंत्रालय को डेढ दर्जन से अधिक पत्र लिखे। गहलोत सरकार का तर्क था कि योजना की डीपीआर प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा 2017 में बनाई गई थी, हम राष्ट्रीय परियोजना की सभी शर्तों को पूरा कर रहे हैं। इसके बाद से ही यह योजना केन्द्रीय जल आयोग में परीक्षण के लिए विचाराधीन थी।

हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री गहलोत राज्य के संसाधनों के जरिए इस योजना को पूरा करवाने की बात कर रहे थे। उनक कहना था कि केन्द्र ईआरसीपी को राष्टÑीय परियोेजना का दर्जा दे या न दे राज्य सरकार अपने संसाधनों से इस परियोजना को पूरा करेगी। केन्द्र सरकार के उपक्रम वेप्कॉस लिमिटेड की ओर से तैयार प्रोजेक्ट रिर्पोट में इस योजना पर तकरीबन 37, 247.12 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है और पूरी परियोजना को अगले 7 साल में पूरा किया जाने का लक्ष्य है। दरअसल, केन्द्र और राज्य सरकार के अलावा इस परियोजना में एक पेच मध्यप्रदेश सरकार का भी था। ईआरसीपी पर मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय तक विवाद था। राजस्थान सरकार 75 फीसदी पानी की मांग कर रही थी जबकि मध्यप्रदेश 50 फीसदी से अधिक पानी देने के लिए तैयार नहीं था। पिछले पांच साल में न तो दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर सहमति बन पाई और न ही केन्द्र सरकार ने इसे राष्टÑीय परियोजना घोषित किया। लेकिन अब राजस्थान और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की डब्बल इंजन की सरकार आते ही प्रोजेक्ट को न केवल राष्टÑीय परियोजना में बल्कि प्राथमिकता लिंक के रूप में शामिल किया गया है। 

ईआरसीपी के तहत पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों झालावाड़, बारां, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, दौसा, अलवर, जयपुर, अजमेर और टोंक जिलों में 2.02 लाख हेक्टेयर नई सिंचाई भूमि विकसित हो सकेगी। साथ ही इन जिलों में  स्थित बांधों में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सकेगा। परियोजना में पेयजल के लिए 1723.5 एमसीएम (मिलियन घन मीटर) का भी प्रावधान किया गया है। परियोजना के पूर्ण होने के बाद राज्य की लगभग 40 प्रतिशत आबादी अर्थात 3 करोड़ लोगों को पेयजल उपलब्ध हो सकेगा।  ईआरसीपी में सम्मिलित रामगढ़ बैराज, महलपुर बैराज, नवनैरा बैराज, मेजा बैराज, राठौड़ बैराज, डूंगरी बांध, रामगढ़ बैराज से डंूगरी बांध तक फीडर तंत्र, ईसरदा बांध की भराव क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ इनका पुनरूद्धार किया जाएगा। इसके अलावा मानसून के समय पार्वती, कालीसिंध, मेज नदी में मानसुन के दौरान आने वाले जरूरत से ज्यादा बरसाती पानी को बनास, मोरेल, बाणगंगा और गंभीरी नदी तक लाने की योजना है। कुल मिलाकर कहा जाए तो ईआरसीपी से पूर्वी राजस्थान की 11 नदियों को आपस में जोड़े जाने की योजना है।पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के लागू होने से न केवल स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नदियों को जोड़ने का सपना साकार होगा बल्कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए बांध और बड़े तालाबों में पानी का संचय किया जाएगा। इसका एक बड़ा फायदा आसपास के क्षेत्र के भूमिगत जलस्तर को ऊपर उठाने में  मिलेगा। साथ ही इन 13 जिलों के अंदर आने वाले उद्योगों सहित दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (डीएमआरसी) द्वारा 286.4 एमसीएम पानी का उपयोग कर सकेंगे। इससे राज्य के भीतर औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से इंदिरा गांधी नहर ने पश्चिमी राजस्थान की तकदीर बदल दी।   

-डॉ. एन.के. सोमानी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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