बीएमसी चुनाव : उद्धव की अग्नि परीक्षा, ठाकरे भाइयों का गठजोड़, शिवसेना (यूबीटी) के लिए मुंबई में साख बचाने की जंग

बीएमसी चुनाव उद्धव ठाकरे के लिए अग्निपरीक्षा

बीएमसी चुनाव : उद्धव की अग्नि परीक्षा, ठाकरे भाइयों का गठजोड़, शिवसेना (यूबीटी) के लिए मुंबई में साख बचाने की जंग

मुंबई की राजनीति में 15 जनवरी को होने वाले बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकते हैं। जून 2022 में पार्टी टूटने के बाद यह उद्धव ठाकरे की तीसरी बड़ी चुनावी परीक्षा है। कभी 25 वर्षों तक बीएमसी पर शासन करने वाली अविभाजित शिवसेना अब बदले हुए राजनीतिक हालात में दोबारा मुंबई की सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही है।

नई दिल्ली। 15 जनवरी को होने वाले बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा माने जा रहे हैं। जून 2022 में पार्टी टूटने के बाद यह उद्धव ठाकरे की तीसरी बड़ी चुनावी लड़ाई है। कभी 25 साल तक बीएमसी पर शासन करने वाली अविभाजित शिवसेना अब एक बार फिर मुंबई की सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही है। बीएमसी देश के सबसे अमी नगर निगम है और इसका बजट कई छोटे राज्यों से भी ज्यादा है। आखिरी बार इसके चुनाव फरवरी 2017 में हुए थे। ऐसे में इस बार का चुनाव सिर्फ स्थानीय राजनीति नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

विधानसभा चुनावों से भी ज्यादा अहम 

बीएमसी जिसे आधिकारिक तौर पर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन आॅफ ग्रेटर मुंबई कहा जाता है, उसकी स्थापना 1873 में हुई थी। आजादी के बाद 1948 में यहां पहली बार वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव हुए। समय के साथ इसके वार्डों की संख्या बढ़ती गई1963 में 140, 1982 में 170 और 1991 में 221 वार्ड बने। देश की आर्थिक राजधानी होने के कारण बीएमसी के चुनाव अक्सर विधानसभा चुनावों से भी ज्यादा अहम माने जाते हैं।

राज ठाकरे के साथ गठबंधन लेकिन राह आसान नहीं

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मराठी वोट को एकजुट करने के लिए उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से गठबंधन किया है। राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना छोड़ी थी और 2006 में एमएनएस बनाई थी। हालांकि यह गठबंधन भावनात्मक तौर पर मजबूत दिखता है, लेकिन जमीन पर इसकी चुनावी ताकत को लेकर सवाल बने हुए हैं। सेना (यूबीटी) को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। शिवसेना को अक्सर बीएमसी पर काबिज पार्टी कहा गया, लेकिन सच्चाई यह है कि उसने कभी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं किया। 1985 में पहली बार जीत मिली थी, तब 170 में से 74 सीटें आईं। 1997 में पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा और 221 में से 103 सीटें आईं। इसके बाद सीटें लगातार घटीं और 2017 में सिर्फ 84 पर आ गईं।

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बीजेपी का उभार और शिवसेना की गिरती ताकत

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पहले शिवसेना की सहयोगी रही बीजेपी अब महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। बीएमसी में बीजेपी की सीटें 2017 में बढ़कर 82 हो गई थीं, जो शिवसेना से सिर्फ दो कम थीं। अब बीजेपी पहली बार बीएमसी पर कब्जा करने की तैयारी में है। 2022 की पार्टी टूट से उद्धव ठाकरे को बड़ा नुकसान हुआ। न सिर्फ सरकार गई, बल्कि पार्टी का संगठन और पारंपरिक वोट बैंक भी बंट गया। 2019 में संयुक्त शिवसेना को 16% वोट मिले थे। 2024 में दोनों गुट मिलकर 20% से ज्यादा वोट लाए जिसमें शिंदे गुट को 12% और उद्धव गुट को 10% वोट मिले।

मराठी वोट की हकीकत

राज ठाकरे की एमएनएस को अक्सर तेज बयानबाजी के लिए जाना जाता है, लेकिन चुनावी सफलता सीमित रही है। 2009 में 13 विधायक और 2012 में बीएमसी में 27 सीटें इसके बाद पार्टी कोई बड़ा असर नहीं दिखा सकी। मुंबई में मराठी आबादी भी उतनी नहीं है जितनी आमतौर पर मानी जाती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, शहर की सिर्फ 35% आबादी की मातृभाषा मराठी है, जबकि 25% हिंदी बोलने वाले हैं। ऐसे में सिर्फ मराठी अस्मिता के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं।

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