सीईईडब्ल्यू रिपोर्ट में खुलासा: स्वच्छ ऊर्जा की नई लहर, दिल्ली और तमिलनाडु में 17% घरों में ई-कुकिंग
ई-कुकिंग का बढ़ता क्रेज: दिल्ली और तमिलनाडु सबसे आगे
एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत में इलेक्ट्रिक कुकिंग का चलन बढ़ रहा है। दिल्ली और तमिलनाडु के 17% परिवार इंडक्शन और माइक्रोवेव अपनाकर शीर्ष पर हैं। एलपीजी की बढ़ती कीमतों के बीच ई-कुकिंग एक सस्ता और आधुनिक विकल्प बनकर उभरा है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी इसका विस्तार होना बाकी है।
नई दिल्ली। भारत में स्वच्छ ऊर्जा और रसोई के आधुनिकीकरण को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन के अनुसार, देश के कई राज्यों में इलेक्ट्रिक कुकिंग (ई-कुकिंग) के प्रति रुझान तेजी से बढ़ा है। इस सूची में दिल्ली और तमिलनाडु सबसे ऊपर हैं, जहां तकनीक और जागरूकता के कारण परिवारों ने पारंपरिक ईंधनों के विकल्प के रूप में बिजली से चलने वाले उपकरणों को अपनाया है।
प्रमुख राज्यों का प्रदर्शन: अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली और तमिलनाडु के लगभग 17 प्रतिशत परिवारों ने इंडक्शन कुकटाप, राइस कुकर और माइक्रोवेव ओवेन जैसे उपकरणों को अपनी रसोई का हिस्सा बनाया है। इसके बाद तेलंगाना का नंबर आता है, जहां 15 प्रतिशत परिवार ई-कुकिंग का उपयोग कर रहे हैं। वहीं, केरल और असम में यह दर 12 प्रतिशत दर्ज की गई है।
शहरी बनाम ग्रामीण अंतर
ई-कुकिंग को अपनाने के मामले में शहरी और ग्रामीण भारत के बीच एक बड़ा अंतर स्पष्ट नजर आता है-
शहरी क्षेत्र : यहां ई-कुकिंग का विस्तार 10.3 प्रतिशत है।
ग्रामीण क्षेत्र : ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा महज 2.7 प्रतिशत पर सिमटा हुआ है।
राष्ट्रीय औसत : यदि पूरे देश की बात करें, तो अब तक केवल पांच प्रतिशत परिवारों ने ही ई-कुकिंग को पूरी तरह या आंशिक रूप से अपनाया है।
किफायती विकल्प : बिजली बनाम एलपीजी
ई-कुकिंग एक सस्ता विकल्प: सीईईडब्ल्यू का अध्ययन एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू की ओर भी इशारा करता है। वर्तमान में एलपीजी सिलिंडरों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, ई-कुकिंग एक सस्ता विकल्प साबित हो सकता है। विशेष रूप से उन परिवारों के लिए जिन्हें सब्सिडी आधारित बिजली मिलती है, बिजली पर खाना बनाना गैस की तुलना में अधिक किफायती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शहरी भारत में ई-कुकिंग अपनी जगह बना रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहुंच बढ़ाने के लिए ग्रामीण बुनियादी ढांचे और बिजली आपूर्ति में सुधार की आवश्यकता है।

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