पश्चिम एशिया संकट खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा समर्थन : 18 देशों ने की तत्काल युद्धविराम की अपील, लेबनान को कूटनीतिक वार्ताओं का हिस्सा बनाना अनिवार्य 

वैश्विक पुकार: लेबनान में युद्धविराम के लिए एकजुट हुए 18 देश

पश्चिम एशिया संकट खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा समर्थन : 18 देशों ने की तत्काल युद्धविराम की अपील, लेबनान को कूटनीतिक वार्ताओं का हिस्सा बनाना अनिवार्य 

लेबनान में शांति के लिए 18 देशों का महा-अभियान शुरू हुआ है। ब्रिटेन और फ्रांस सहित इन देशों ने तत्काल युद्धविराम और मानवीय संकट रोकने की अपील की है। इजरायल और हिज्बुल्ला के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने हेतु उन्होंने संप्रभुता का सम्मान करने और कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से स्थायी समाधान निकालने पर जोर दिया।

बेरुत। लेबनान में जारी जंग को रोकने के लिए कनाडा-ब्रिटेन समेत 10 देशों की शुरू की गयी शांति पहल अब बड़े वैश्विक अभियान में बदलती नजर आ रही है। मंगलवार को जारी इस साझा बयान का समर्थन करते हुए यूरोप के आठ अन्य देश भी इसमें शामिल हो गये हैं। इससे अब कुल 18 देशों ने एक सुर में लेबनान में तत्काल युद्धविराम की अपील की है। इन देशों ने बढ़ते मानवीय संकट और विस्थापन पर गहरी चिंता जताते हुए स्पष्ट किया है कि क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए लेबनान को कूटनीतिक वार्ताओं का हिस्सा बनाना अनिवार्य है।

बयान में मार्च में लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के तीन शांति रक्षकों की हत्या की भी निंदा की गयी है। संयुक्त राष्ट्र ने पिछले हफ्ते तीन इंडोनेशियाई शांति रक्षकों की मौत की शुरुआती जांच रिपोर्ट जारी की थी। इसमें पाया गया कि ये दो हमले संभवतः इजरायली टैंक के गोले और एक आईईडी के कारण हुए थे। मुमकिन है कि वह हिजबुल्ला ने लगाया हो। संयुक्त बयान में कहा गया, "हम ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, क्रोएशिया, साइप्रस, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, ग्रीस, आइसलैंड, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, स्पेन, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम के विदेश मंत्री, क्षेत्रीय तनाव कम करने के प्रयासों में लेबनान को शामिल करने का आह्वान करते हैं और सभी पक्षों से एक स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में काम करने का आग्रह करते हैं।"

लेबनान में युद्ध जारी रहने से मौजूदा क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिशों को खतरा पैदा हो गया है, जिसका सभी पक्षों को पूरी तरह से सम्मान किया जाना चाहिए। इन देशों ने इजरायल के साथ सीधी बातचीत शुरू करने की लेबनान की पहल और अमेरिका की मध्यस्थता में वार्ता शुरू करने की इजरायल की स्वीकृति का स्वागत किया है। बयान में कहा गया है, "हम दोनों पक्षों से इस अवसर का लाभ उठाने का आह्वान करते हैं। सीधी बातचीत लेबनान, इजरायल और इस पूरे क्षेत्र के लिए स्थायी सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। हम उनका समर्थन करने के लिए तैयार हैं। इसलिए हम सभी पक्षों से आग्रह करते हैं कि वे तनाव कम करें और अमेरिका व ईरान के बीच युद्धविराम से मिले इस अवसर का फायदा उठाएं।"

इसमें कहा गया है "हम इजरायल के खिलाफ हिजबुल्ला के हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं, जिन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए। हम आठ अप्रैल को लेबनान पर इजरायल की ओर से किये गये बड़े हमलों की भी सख्त निंदा करते हैं। इसमें लेबनानी अधिकारियों की साझा की गयी ताजा जानकारियों के अनुसार, 350 से अधिक लोग मारे गये और 1,000 से अधिक घायल हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुसार नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की रक्षा की जानी चाहिए।"

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इन देशों ने 'लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल' के खिलाफ हमलों की भी कड़े शब्दों में निंदा की और दोहराया कि संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षकों की सुरक्षा और सलामती हर समय सुनिश्चित की जानी चाहिए। नेतृत्व समूह ने लेबनानी जनता और वहां के अधिकारियों के प्रति अपनी पूरी एकजुटता और अटूट समर्थन व्यक्त किया। इसके साथ ही, लेबनान सरकार के साथ समन्वय कर 10 लाख से अधिक विस्थापित लोगों को आपातकालीन सहायता प्रदान करने का संकल्प लिया।

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इन देशों ने लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 (2006) को पूरी तरह से लागू करने के महत्व की पुष्टि की। वे अपने क्षेत्र पर पूर्ण संप्रभुता का प्रयोग करने में लेबनान का समर्थन करना जारी रखेंगे।
गौरतलब है कि लेबनान में शांति बहाली के लिए यह पहली कोशिश नहीं है। इससे पहले मार्च 2026 के आखिरी हफ्ते में यूरोपीय संघ (ईयू) के नेतृत्व में बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने भी इसी तरह का आह्वान किया था।

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इसके अलावा, सितंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भी अमेरिका और फ्रांस ने एक अस्थायी युद्धविराम का प्रस्ताव रखा था। इसे तब सऊदी अरब और कतर जैसे क्षेत्रीय देशों का भी साथ मिला था। हालांकि, मंगलवार का यह ताजा कदम इसलिए खास है, क्योंकि इसकी शुरुआत भले ही 10 देशों के छोटे समूह ने की थी, लेकिन देखते ही देखते इसमें यूरोप के कई प्रभावशाली राष्ट्र जुड़ते गये, जो इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती एकजुटता को दर्शाता है।

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