चंद्रयान-3 के "हॉप" प्रयोग ने चंद्रमा के छिपे रहस्यों को किया उजागर, वैज्ञानिकों को दक्षिणी ध्रुव पर मिली 'रेगोलिथ हेटेरोजेनिटी'

विक्रम लैंडर के 'हॉप' प्रयोग से खुले चांद के दक्षिणी ध्रुव के रहस्य

चंद्रयान-3 के

इसरो के चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर द्वारा किए गए 'हॉप' प्रयोग से चंद्रमा की सतह (लूनर रेगोलिथ) की जटिल संरचना और तापीय गुणों का खुलासा हुआ है। चास्टे (ChaSTE) उपकरण के विश्लेषण से पता चला है कि चांद की ऊपरी परत अत्यधिक छिद्रयुक्त और चिपचिपी है, जो भविष्य के मानव आवास और जल-बर्फ खोज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चेन्नई। भारत के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर द्वारा किए गए 'हॉप' प्रयोग ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से जुड़े कई छिपे रहस्यों का खुलासा किया है। वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के जरिए चंद्र सतह की रेगोलिथ विषमता (रेगोलिथ हेटेरोजेनिटी) का पता लगाया है, जो भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन निष्कर्षों से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सतही अभियानों को लेकर नई जानकारी मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर सतह की विविधता को समझना भविष्य में चंद्रमा पर वैज्ञानिक आधार और आवास निर्माण की योजनाओं के लिए आवश्यक है। यह अध्ययन इस प्रकार का पहला अनूठा उदाहरण है।

उल्लेखनीय है कि चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरा था। करीब 10 पृथ्वी दिवस तक चंद्र सतह, निकट-सतही प्लाज्मा और भू-कंपनों से जुड़े प्रयोग करने के बाद, दो सितंबर 2023 को लैंडर ने बचा हुआ ईंधन इस्तेमाल कर 'हॉप' प्रयोग किया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने मंगलवार को कहा कि यह 'हॉप' भविष्य में चंद्रमा से नमूने पृथ्वी पर लाने वाले अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता साबित हुआ है। इसरो ने कहा कि जिसे सामान्य तौर पर 'चंद्र मिट्टी' कहा जाता है, उसका सही वैज्ञानिक नाम 'लूनर रेगोलिथ' है। यह दरअसल चट्टानों के टूटे हुए अत्यंत महीन, नुकीले और कांच जैसे कणों से बना होता है, जो बेहद खुरदरे होते हैं और स्थैतिक विद्युत की तरह हर चीज से चिपक जाते हैं। इसरो के अनुसार चंद्र रेगोलिथ के तापीय और भौतिक गुणों को समझना वैज्ञानिक और तकनीकी दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके ताप-भौतिक गुण यह समझने में मदद करते हैं कि चंद्रमा सूर्य से प्राप्त ऊष्मा को किस प्रकार अवशोषित और अंतरिक्ष में विकिरत करता है।

इसी उद्देश्य से विक्रम लैंडर पर 'चंद्रा सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट' (चास्टे) उपकरण लगाया गया था। यह एक नुकीला, छड़नुमा उपकरण था, जिसमें तापमान मापक सेंसर और अग्रभाग पर हीटर लगाया गया था, जो चंद्र रेगोलिथ में प्रवेश कर उसके गुणों का अध्ययन करता था। लैंडर के 'हॉप' के दौरान चास्टे ने दूसरे स्थान पर भी विश्लेषण किया और यह देखा कि इंजन की गैसों के दबाव से चंद्र सतह किस प्रकार प्रभावित हुई। इससे वैज्ञानिकों को चंद्रमा के 'ट्वाइलाइट' यानी सांध्यकाल के दौरान भी मापन करने का अवसर मिला। इसरो ने कहा कि चंद्रमा पर एक दिन-रात चक्र पृथ्वी के लगभग एक महीने के बराबर होता है। ऐसे में वहां का सांध्यकाल कुछ मिनटों का न होकर कई घंटों तक चलता है, जिससे वैज्ञानिकों को सतह के धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रक्रिया का अध्ययन करने का अवसर मिलता है। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों के आधार पर चंद्रमा के उच्च अक्षांशीय क्षेत्र की रेगोलिथ परत के ताप-भौतिक और भू-तकनीकी गुणों का विश्लेषण किया।

चास्टे द्वारा दर्ज तापमान और प्रवेश बल के आंकड़ों से संकेत मिला कि लैंडर इंजनों के दोबारा प्रज्वलन से रेगोलिथ की ऊपरी कुछ सेंटीमीटर परत प्रभावित हुई और उसकी ऊपरी मुलायम परत हट गयी। यह परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से चास्टे के मापों में दर्ज हुआ, जिसे अन्यथा देख पाना संभव नहीं था। इसके अलावा, चंद्रयान-2 के ओएचआरसी उच्च-रिजॉल्यूशन आंकड़ों पर आधारित त्रि-आयामी मॉडलिंग से यह भी पता चला कि रेगोलिथ की संरचना अत्यंत जटिल है और उसके भू-तकनीकी तथा तापीय गुण विशिष्ट हैं। अध्ययन में पाया गया कि रेगोलिथ की ऊपरी दो से छह सेंटीमीटर परत अत्यधिक चिपचिपी और अत्यधिक छिद्रयुक्त है, जो तापीय कंबल की तरह कार्य कर सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह परत उप-सतह में जल-बर्फ अणुओं के संरक्षण तथा भविष्य में चंद्रमा पर वैज्ञानिक केंद्र और आवास निर्माण के लिए उपयुक्त स्थलों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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