खाड़ी क्षेत्र में व्यवधान से वैश्विक आपूर्ति में संकट : भारत पर भी पड़ेगा असर, हीलियम, सल्फर, मेथनॉल और एल्युमिनियम जैसी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित
विमानन क्षेत्र पर भी असर पड़ेगा
खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण हीलियम, सल्फर, मेथनॉल, एल्युमिनियम और कच्चे तेल जैसी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती। सेमीकंडक्टर, उर्वरक, निर्माण और विमानन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता। भारत में एलपीजी और तेल की आयात निर्भरता संवेदनशील, महंगाई और राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा।
नई दिल्ली। खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव और संभावित व्यवधानों के कारण कई प्रमुख क्षेत्रों में वैश्विक आपूर्ति संकट उत्पन्न हो सकता है, जिसका असर सेमीकंडक्टर और निर्माण जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। डैम कैपिटल एडवाइजर्स की एक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, हीलियम, सल्फर, मेथनॉल और एल्युमिनियम जैसी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे सेमीकंडक्टर निर्माण, उर्वरक और निर्माण जैसे उद्योगों पर असर पड़ेगा। उर्वरक आपूर्ति शृंखलाओं में बाधा आने से कृषि लागत बढ़ सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की उपलब्धता अल्पावधि में संभालने योग्य रह सकती है, लेकिन एलपीजी, नैफ्था, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) और गैस ऑयल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा, क्योंकि रिफाइनिंग क्षमता सीमित है। साथ ही, वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है, जिससे प्राकृतिक गैस बाजार में भी दिक्कत आ सकती है।
राजकोषीय घाटा लगभग 100 अरब तक बढ़ सकता है :
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो व्यापक आर्थिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। प्रत्येक एक डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से राजकोषीय घाटा लगभग 100 अरब रुपये तक बढ़ सकता है। यदि कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो महंगाई 4.5 प्रतिशत से अधिक हो सकती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
एलपीजी की उपलब्धता अधिक संवेदनशील :
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आयात निर्भरता, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए, जोखिम को और बढ़ाती है। देश के लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात और 50 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल इसी मार्ग से आता है। जबकि कच्चे तेल की आपूर्ति वैकल्पिक स्रोतों और भंडार के कारण कुछ हद तक संभाली जा सकती है, एलपीजी की उपलब्धता सीमित भंडार के कारण अधिक संवेदनशील बनी हुई है।
विमानन क्षेत्र पर भी असर पड़ेगा :
उच्च कीमतों से अपस्ट्रीम तेल एवं गैस कंपनियों को लाभ हो सकता है, जबकि डाउनस्ट्रीम कंपनियों, विशेषकर तेल विपणन कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बढ़ेगा। विमानन क्षेत्र पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि ईंधन लागत परिचालन खर्च का लगभग 40 प्रतिशत तक होती है। एफएमसीजी कंपनियों को पैकेजिंग लागत बढ़ने से दबाव झेलना पड़ सकता है, जबकि बुनियादी ढांचा और पूंजीगत व्यय भी प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वस्त्र, रसायन और उर्वरक जैसे उद्योगों पर लागत बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने का असर पड़ेगा, हालांकि कुछ क्षेत्रों को अल्पकालिक इन्वेंट्री लाभ मिल सकता है। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष दो महीने से अधिक समय तक जारी रहता है, तो इससे गंभीर आपूर्ति संकट, लागत में वृद्धि और वैश्विक तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक मंदी का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

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