जयपुर में रसोई की आग ठण्डी : 25 दिन की समय सीमा ने बढ़ाई उपभोक्ताओं की परेशानी, बुकिंग का अंबार, सप्लाई की सुस्त रफ्तार
व्यवस्था करने में जिला प्रशासन फेल
राजस्थान की राजधानी जयपुर में इन दिनों रसोई गैस सिलेंडर को लेकर गहरी चिंता और नाराजगी का माहौल है। 25 दिन की अनिवार्य समय सीमा के चलते उपभोक्ता समय पर गैस सिलेंडर बुक नहीं कर पा रहे हैं।
जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर में इन दिनों रसोई गैस सिलेंडर को लेकर गहरी चिंता और नाराजगी का माहौल है। 25 दिन की अनिवार्य समय सीमा के चलते उपभोक्ता समय पर गैस सिलेंडर बुक नहीं कर पा रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई घरों में चूल्हे ठंडे पड़ने लगे हैं और लोगों को वैकल्पिक इंतजामों के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गैस कंपनियों की ओर से तय की गई यह शर्त कि एक शहरी उपभोक्ता 25 दिन पूरे होने से पहले अगला सिलेंडर बुक नहीं कर सकता, अब आम लोगों के लिए भारी पड़ रही है। जिन परिवारों में सदस्य अधिक हैं या जहां रोजÞमर्रा का खाना अधिक मात्रा में बनता है, वहां एक सिलेंडर 20 से 22 दिनों में ही खत्म हो जाता है। ऐसे में बचे हुए दिनों में उन्हें इंतजार करना पड़ता है। जयपुर के मानसरोवर निवासी रमेश शर्मा और लंकापुरी शास्त्रीनगर निवासी मानसिंह बताते हैं कि हमारे घर में 6 लोग हैं। 20 दिन में सिलेंडर खत्म हो जाता है, लेकिन बुकिंग 25 दिन बाद ही हो सकती है। इन 5 दिनों में हमें बाहर से खाना मंगवाना पड़ता है या लकड़ी-कोयले का सहारा लेना पड़ता है।
मोबाइल नंबर नहीं मिलता : समस्या और गंभीर
स्थिति को और जटिल बना रहा है गैस एजेंसी संचालकों से संपर्क का अभाव। कई उपभोक्ताओं का कहना है कि एजेंसियों के मोबाइल नंबर या तो उपलब्ध नहीं हैं या फिर लगातार बंद रहते हैं। कुछ नंबरों पर कॉल करने पर कोई जवाब नहीं मिलता। भट्टाबस्ती निवासी रियाज अहमद और विद्याधर नगर निवासी शांति देवी कहती हैं कि हम कई बार एजेंसी के नंबर पर कॉल करते हैं, लेकिन कोई उठाता ही नहीं। जब खुद एजेंसी जाते हैं तो वहां लंबी लाइन और कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता।
ऑनलाइन व्यवस्था भी फेल :
डिजिटल इंडिया के इस दौर में ऑनलाइन बुकिंग एक समाधान हो सकता था, लेकिन कई उपभोक्ताओं का कहना है कि ऐप और वेबसाइट भी सही से काम नहीं कर रहे। कभी सर्वर डाउन रहता है तो कभी बुकिंग स्वीकार नहीं होती। कुछ बुजुर्ग उपभोक्ताओं के लिए यह समस्या और भी बड़ी है, क्योंकि वे न तो स्मार्टफोन का उपयोग कर पाते हैं और न ही ऑनलाइन प्रक्रिया को समझ पाते हैं। उनके लिए एजेंसी से सीधा संपर्क ही एकमात्र विकल्प है, जो फिलहाल लगभग असंभव हो गया है।
महिलाओं और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा असर :
इस संकट का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। घर की रसोई की जिम्मेदारी संभालने वाली महिलाओं को अचानक गैस खत्म होने पर कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। गोनेर रोड निवासी सीमा गुप्ता कहती हैं कि बच्चों के लिए खाना बनाना हो या बुजुर्गों को समय पर भोजन देना, गैस के बिना सब कुछ ठप हो जाता है। मजबूरी में हमें महंगे दामों पर बाहर से खाना मंगवाना पड़ता है, जो हर दिन संभव नहीं है।
ब्लैक मार्केटिंग की आशंका :
शहर के कुछ इलाकों से ये भी खबरें आ रही हैं कि इस संकट का फायदा उठाकर कुछ लोग गैस सिलेंडर की कालाबाजारी कर रहे हैं। जरूरतमंद उपभोक्ताओं को ऊंचे दामों पर सिलेंडर बेचे जा रहे हैं। हालांकि जिला प्रशासन की ओर से इस की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन उपभोक्ताओं का कहना है कि जांच की जानी चाहिए, ताकि दोषियों पर कार्रवाई हो सके।
प्रशासन और कंपनियों की चुप्पी :
इस पूरे मामले में अब तक न तो स्थानीय प्रशासन और न ही गैस कंपनियों की ओर से कोई स्पष्ट बयान आया है। उपभोक्ता बार-बार शिकायतें दर्ज करा रहे हैं, लेकिन समाधान नहीं मिल रहा।
व्यवस्था करने में जिला प्रशासन फेल :
शहर में गैस की आपूर्ति को व्यवस्थित करने में जिला प्रशासन पूरी तरह नाकाम है। रसद विभाग के अधिकारी कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय सारा दोष गैस एजेंसियों के माथे मढ़ रहे हैं।

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