‘आपदा को अवसर में बदला’: बदल गया रोटी का जायका, ढाबा संचालक ने गैस सिलेण्डरों के बजाय तंदूर किए शुरू
पहले तो गैस सिलेण्डरों से चलने वाले चूल्हे के साथ ही आनन-फानन में दो तंदूर तैयार करवाए गए
राजापार्क के पंचवर्टी सर्किल स्थित एक ढाबे ने गैस सिलेंडर की किल्लत को अवसर में बदला। संचालक देवेंद्रपाल सिंह राणा ने रोटी बनाने के लिए दो तंदूर शुरू। तंदूर की रोटी का स्वाद ग्राहकों को पसंद आ रहा। ग्राहकों का कहना है कि पहले तंदूर की रोटियां ही बनती थीं, अब पुराना जायका फिर लौट आया।
जयपुर। कहा गया है कि आपदा को कोसने के बजाए यदि आपदा को अवसर में बदल दिया जाए तो उसके परिणाम बहुत ही सार्थक होते हैं।
कुछ ऐसा ही राजापार्क के पंचवर्टी सर्किल स्थित ढ़ाबा संचालक ने कॉम्शियल गैस सिलेण्डरों की आफत आने के साथ ही रोटी की सिकाई के लिए दो तंदूर तैयार करवाए। जैसे ही तंदूर से रोटी सिकने लगी तो ग्राहकों को रोटी पसन्द आने लगी। होटल संचालक देवेन्द्रपाल सिंह उर्फ राणा ने बताया कि युद्ध होने के साथ ही गैस सिलेण्डरों की किल्लत का पहले ही अहसास हो गया था उनके लिए पारीक कॉलेज से कोयला लाकर तंदूर से रोटी की सिकाई और सिकने का अन्य कार्य गैस के चूल्हे के बजाए तंदूर पर पहले वाला जायका याद आने लगा।
साइकिल चलती रहती है :
ढाबे पर तंदूर की रोटी को बड़े ही चाव से खा रहे उमेश कुमार ने बताया कि पहले तंदूर से ही रोटी बनती थी, लेकिन बाद में जल्दी-जल्दी के चक्कर में गैस के चूल्हे आ गए। इधर, पाली शुद्ध शाकाहारी ढाबा के संचालक राणा करते हैं कि साइकिल चलती रहती हैं, सालो-साल भट्टी और तंदूर से ही रोटी सिकती थी, कुछ साल पहले गैस की दस्तक देने के साथ ही हमने भी गैस चूल्हे का उपयोग शुरू कर दिया।

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