राजस्थान की देवांशी बनीं विश्व योगा ‘सुपरमॉम’, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग दिवस आह्वान ने बदली किस्मत  

बेटे से दूर रहकर जीता विश्व खिताब

राजस्थान की देवांशी बनीं विश्व योगा ‘सुपरमॉम’, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग दिवस आह्वान ने बदली किस्मत  
देवांशी शर्मा, राजस्थान पुलिस कांस्टेबल, ने अहमदाबाद में हुई पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में सीनियर-बी हैंड बैलेंस व्यक्तिगत वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। 36 वर्षीय देवांशी ने कुश्ती से खेल करियर शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ने उनके जीवन को नया मार्ग दिया।

जयपुर। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखने के बाद योग एक वैश्विक जनआंदोलन बन गया। इस पहल ने राजस्थान की देवांशी शर्मा के जीवन को भी नई दिशा दी। कभी अपने भविष्य को लेकर संघर्ष कर रही देवांशी आज विश्व योगासन चैंपियनशिप की स्वर्ण पदक विजेता और ह्यसुपरमॉमह्ण के रूप में नई पहचान बना चुकी हैं। राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत देवांशी शर्मा ने अहमदाबाद में आयोजित पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में सीनियर-बी हैंड बैलेंस व्यक्तिगत वर्ग का स्वर्ण पदक जीत देश का नाम रोशन किया। खास बात यह रही कि वह अपने 15 माह के बेटे को घर पर छोड़कर इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचीं और विश्व विजेता बनकर लौटीं।

20 साल पुराना सपना हुआ साकार :

36 वर्षीय देवांशी का खेल सफर योग से नहीं, बल्कि कुश्ती से शुरू हुआ था। कॉलेज के दिनों में कुश्ती में कई पदक जीते और खेलों में करियर बनाने का प्रयास किया। बाद में उन्होंने योग में डिप्लोमा किया। कुश्ती से मिली शारीरिक शक्ति और योग से विकसित लचीलापन उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए। स्वर्ण पदक जीतने के बाद देवांशी ने कहा, करीब 20 साल से मेरा सपना भारत का प्रतिनिधित्व करने का था। यह नहीं जानती थी कि यह सपना किस रास्ते से पूरा होगा, लेकिन आज वह सपना सच हो गया है।

योग दिवस बना मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट :

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देवांशी बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत के बाद जयपुर विकास प्राधिकरण ने योग प्रशिक्षकों की भर्ती निकाली। उन्होंने आवेदन किया और चयनित हो गईं। अगले छह वर्षों तक उन्होंने जयपुर के पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर हजारों लोगों को योग का प्रशिक्षण दिया। वह कहती हैं, जब मैं अपने जीवन में दिशा तलाश रही थी, तब यह अवसर मिला। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि वही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था।

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पुलिस सेवा में मिली नई पहचान :

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करीब 9 वर्ष पहले देवांशी राजस्थान पुलिस में खेल कोटे से भर्ती हुईं। उनकी मां की इच्छा थी कि वह वर्दी पहनकर देश की सेवा करें। नौकरी मिलने तक वह कुश्ती छोड़कर पूरी तरह योग को अपना चुकी थीं। राजस्थान पुलिस ने भी उनके खेल के प्रति समर्पण को समझा और योगासन प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पूरा सहयोग दिया।

बेटे से दूर रहकर जीता विश्व खिताब :

विश्व चैंपियनशिप की तैयारी के दौरान देवांशी को लगभग एक महीने तक अपने 15 माह के बेटे से दूर रहना पड़ा। एक मां के लिए यह सबसे कठिन परीक्षा थी। उन्होंने बताया कि उनका बेटा लगभग हर प्रतियोगिता में उनके साथ रहा है, लेकिन इस बार परिवार ने जिम्मेदारी संभाली ताकि वह पूरी तरह अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

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