बालिग लड़की की शादी में भी उसकी सहमति जरूरी, उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा- दबाव में शादी कराना स्वस्थ समाज के अनुकूल नहीं
बालिग लड़की की सहमति अवश्य लेनी चाहिए
न्यायालय ने यह टिप्पणी एक विवाहित महिला की उस याचिका का निपटारा करते हुए की, जिसमें उसने जबरन कराई गई शादी के बाद अलग रहने की अनुमति मांगी थी।
भुवनेश्वर। उड़ीसा उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई लड़की शादी के लिए तैयार नहीं है, तो बाहरी दबाव या जबरदस्ती के जरिए उसकी शादी कराना स्वस्थ समाज के अनुकूल नहीं है। मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति मुराहारी श्रीरमन की पीठ ने कहा कि अब वह समय आ गया है, जब समाज को आत्ममंथन करना चाहिए कि लड़कियों को उनके माता-पिता द्वारा जबरन शादी के लिए मजबूर करते हैं तो क्या होता है।
जबरन कराई शादी, युवती ने मांगी अलग रहने की इजाजत
न्यायालय ने यह टिप्पणी एक विवाहित महिला की उस याचिका का निपटारा करते हुए की, जिसमें उसने जबरन कराई गई शादी के बाद अलग रहने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में माता-पिता को ऐसा निर्णय लेने से पहले बालिग लड़की की सहमति अवश्य लेनी चाहिए।
ससुराल में रहने में कठिनाई हो रही
सुनवाई के दौरान काकटपुर पुलिस उक्त महिला को अदालत में पेश कर लाई। महिला ने बताया कि जबरन विवाह के कारण उसे ससुराल में रहने में कठिनाई हो रही थी, जिसके चलते वह अपनी मर्जी से वहां से चली गई। उसने साफ कहा कि वह न तो अपने पति के साथ रहना चाहती है और न ही अपने माता-पिता के साथ, क्योंकि वह रोज़गार में है और स्वयं अपनी आजीविका अर्जित करती है। अदालत ने कहा कि महिला बालिग है और अपने फैसले स्वयं लेने में सक्षम है।

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