'द वन' की फैंटेसी को असली बनाता है सिद्धार्थ मल्होत्रा का अभिनय
ऋषि के किरदार को बनाया विश्वसनीय
मुंबई। एक ऐसे जंगल की कहानी, जहां जाना मना है, एक प्राचीन देवता और एक अलौकिक खतरा—द वन की सबसे बड़ी चुनौती इसकी दुनिया को बड़े स्तर पर दिखाना नहीं थी। असली चुनौती यह थी कि क्या उस दुनिया के बीच खड़ा किरदार दर्शकों को विश्वसनीय लगेगा। सिद्धार्थ मल्होत्रा का ऋषि के रूप में अभिनय इसी चुनौती को पूरा करता है। खुद सिद्धार्थ के मुताबिक भी उनका मकसद यही था कि फैंटेसी से भरी इस कहानी के बीच उनका किरदार पूरी तरह वास्तविक और भरोसेमंद लगे।
सिद्धार्थ ने बताया है कि द वन की कहानी भले ही फैंटेसी पर आधारित है, लेकिन उनके किरदार को पूरी तरह वास्तविक और सहज रखने पर जोर दिया गया है। उनका ध्यान इस बात पर रहा कि ऋषि का किरदार जमीन से जुड़ा और विश्वसनीय लगे, भले ही उसके आसपास की दुनिया धीरे-धीरे रहस्यमयी और अलौकिक होती चली जाए। यह अभिनय का एक खास तरह का अनुशासन है। इतनी बड़ी और असाधारण कहानी में अभिनेता आसानी से उसी स्तर की बड़ी प्रतिक्रियाएं और ज्यादा भावनाएं दिखाने लग सकता है। लेकिन द वन के अब तक सामने आए प्रचार से यही संकेत मिलता है कि सिद्धार्थ ने ऋषि के किरदार को सहज और संयमित रखा है। कहानी जैसे-जैसे बड़ी होती जाती है, ऋषि का किरदार उतना ही वास्तविक बना रहता है। यही बात दर्शकों के लिए इस किरदार और उसकी दुनिया को स्वीकार करना आसान बनाती है।
सिद्धार्थ ने इस किरदार के लिए की गई शारीरिक तैयारी के बारे में भी बात की है। उनका कहना रहा है कि मकसद यह नहीं था कि पर्दे पर उनकी ट्रेनिंग साफ नजर आए, बल्कि यह था कि फिल्म शुरू होने के बाद किरदार विश्वसनीय लगे। द वन में उनके काम को इसी नजरिए से देखा जा सकता है। इसके पीछे की मेहनत खुद को दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि एक ऐसे अभिनय का हिस्सा बनने के लिए है, जिसमें वह पूरी तरह घुल जाए। खास तौर पर तब, जब हिंदी दर्शकों के लिए इस तरह के जॉनर में किसी बड़े स्टार को इतने बड़े स्तर पर देखना नया अनुभव है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फोकलोर यानी लोककथा पर आधारित कहानी काफी हद तक दर्शकों के विश्वास पर टिकी होती है। युद्ध पर बनी फिल्म या थ्रिलर में ऐसी दुनिया दिखाई जाती है, जिसे दर्शक पहले से वास्तविक मानते हैं। लेकिन पवित्र जंगल और पीढ़ियों से चली आ रही किसी प्राचीन मान्यता पर आधारित कहानी में उस दुनिया को विश्वसनीय बनाने की जिम्मेदारी काफी हद तक अभिनेता पर होती है। किरदार के संदेह का धीरे-धीरे विश्वास में बदलना और फिर उस विश्वास का मजबूत यकीन में बदल जाना—सिद्धार्थ का अभिनय इसी सफर को पर्दे पर दिखाने के लिए तैयार किया गया है।
सिद्धार्थ के अभिनय के पीछे की सोच भी काफी साफ है। यह सिर्फ मेहनत करने का सामान्य दावा नहीं है, बल्कि इस बात की स्पष्ट समझ है कि वह ऋषि के किरदार के जरिए क्या हासिल करना चाहते थे। उनका लक्ष्य किरदार को ऐसा बनाना था कि वह जिस दुनिया का हिस्सा है, वह पर्दे पर विश्वसनीय लगे और दर्शक उसके साथ जुड़ सकें। द वन में ऋषि की दुनिया का प्रभाव इसी वजह से मजबूत होता है।
हिंदी दर्शकों के लिए एक ऐसे जॉनर को स्वीकार करना, जिसकी मुख्यधारा में बहुत ज्यादा मिसालें नहीं हैं, अपने आप में बड़ी चुनौती है। ऐसे में द वन की कहानी में सिर्फ बड़े और शानदार दृश्यों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि उसके मुख्य किरदार को कितना वास्तविक बनाया गया है। यही वह पहलू है, जो फिल्म की फैंटेसी वाली दुनिया को दर्शकों के लिए भरोसेमंद बनाने में सिद्धार्थ मल्होत्रा के अभिनय की भूमिका को खास बनाता है।

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