आजादी के 79 साल, अब आत्ममंथन का समय

सामूहिक मेहनत का परिणाम

आजादी के 79 साल, अब आत्ममंथन का समय
15 अगस्त केवल स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों को स्मरण करने का दिन है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया। 1947 से 2026 तक भारत ने लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा तय की है।

15 अगस्त केवल स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों को स्मरण करने का दिन है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया। 1947 से 2026 तक भारत ने लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा तय की है। गरीबी, अशिक्षा और अभावों से निकलकर भारत आज विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा, कृषि और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में अपनी पहचान बना रहा है। लेकिन स्वतंत्रता की सार्थकता केवल आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों, न्याय, समान अवसर, ईमानदारी और नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन में भी है। शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनके नाम लेने में नहीं, बल्कि उनके सपनों के भारत को अपने कर्मों से आकार देने में है। 15 अगस्त वास्तव में वह दिन है जब हमें कुछ क्षण के लिए उत्सव से बाहर निकलकर इतिहास की ओर देखना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए कि जिस आजादी के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना आज कुर्बान कर दिया था, उस आजादी का हम क्या कर रहे हैं? भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक नेता, एक विचारधारा या एक संगठन की कहानी नहीं था। यह अनेक धाराओं से मिलकर बनी एक विशाल राष्ट्रीय धारा थी।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम :

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हुए अनेक संघर्षों तक स्वतंत्रता की चेतना निरंतर मजबूत होती गई। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा को जनशक्ति का हथियार बनाया। उन्होंने उस सामान्य भारतीय को भी स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा, जो शायद किसी राजनीतिक संगठन का हिस्सा नहीं था। चरखा, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, नमक सत्याग्रह और असहयोग जैसे प्रतीकों ने आम नागरिक को यह एहसास कराया कि स्वतंत्रता केवल नेताओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और अनेक क्रांतिकारियों ने अपने जीवन की कीमत पर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक अलग सैन्य और अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मातंगिनी हाजरा जैसी महिलाओं ने भी यह सिद्ध किया कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका किसी से कम नहीं थी। और इन प्रसिद्ध नामों के पीछे उन अनगिनत लोगों की लंबी कतार थी, जिनका नाम इतिहास की बड़ी पुस्तकों में शायद दर्ज नहीं हुआ, लेकिन जिनके त्याग के बिना स्वतंत्रता की कहानी पूरी नहीं होती।

सामूहिक मेहनत का परिणाम :

Read More डिजिटल युग में अंधविश्वास को मिलती मजबूती

स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक नेताओं के लिए आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों की विदाई नहीं था, उसका अर्थ था एक ऐसा राष्ट्र जहां भारतीय अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करें। आज भारत अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है। प्रौद्योगिकी ने करोड़ों लोगों के जीवन को बदला है। देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना चुका है। आधारभूत ढांचे, सड़क, रेल, बिजली, दूरसंचार, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा उत्पादन, औषधि निर्माण, कृषि और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। यह उपलब्धियां छोटी नहीं हैं। आजादी के समय भारत के सामने गरीबी, खाद्यान्न संकट, सीमित औद्योगिक आधार, कम साक्षरता और विभाजन की भयावह चुनौती थी। ऐसे भारत का आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी पहचान बनाना सात दशकों से अधिक की सामूहिक मेहनत का परिणाम है। किसी राष्ट्र की शक्ति केवल आर्थिक आंकड़ों, बड़े शहरों या अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से नहीं मापी जाती। असली शक्ति इस बात से तय होती है कि उसका सामान्य नागरिक कितना सुरक्षित, शिक्षित, सक्षम और सम्मानजनक जीवन जी रहा है। भारत के सामने इस समय अवसरों का असाधारण दौर है। विशाल युवा शक्ति, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता, विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था देश को नई संभावनाएं दे रहे हैं। विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है और भारत उस बदलाव में केवल दर्शक बनकर नहीं रह सकता। रोजगार और रोजगार योग्य कौशल, शिक्षा की गुणवत्ता, ग्रामीण-शहरी असमानता, पर्यावरण संरक्षण, जल संकट, सामाजिक तनाव, भ्रामक सूचनाएं और तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी से पैदा होने वाली नई चुनौतियां आने वाले वर्षों में हमारी परीक्षा लेंगी।

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स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा :

2047 में भारत स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा। उस समय आज की पीढ़ी के निर्णयों का मूल्यांकन होगा। संभव है तब भारत की अर्थव्यवस्था और अधिक सशक्त हो। हमारे नगर अधिक आधुनिक हों। प्रौद्योगिकी जीवन का और बड़ा हिस्सा बन चुकी हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान हमारी अर्थव्यवस्था को नया आकार दे रहे हों। लेकिन 2047 का भारत केवल तकनीकी रूप से विकसित होना पर्याप्त नहीं है। यदि देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाए लेकिन समाज में विश्वास कम हो जाए, तो विकास अधूरा रहेगा। यदि प्रौद्योगिकी आगे बढ़ जाए लेकिन शिक्षा और नैतिकता पीछे रह जाए, तो प्रगति असंतुलित होगी। यदि दुनिया भारत की शक्ति को स्वीकार करे लेकिन भारतीय नागरिक अपने कर्तव्यों को भूल जाएं, तो स्वतंत्रता की आत्मा कमजोर होगी। इस बार 15 अगस्त को जब ध्वजारोहण हो, राष्ट्रगान बजे और आकाश में तिरंगा लहराए, तब कुछ क्षण उन चेहरों को याद करने के लिए भी निकालें जिन्हें इतिहास ने भले ही बड़े अक्षरों में दर्ज किया हो, लेकिन जिनके बलिदान ने हमें स्वतंत्र भारत दिया। फिर अपने भीतर एक छोटा-सा संकल्प लेंईमानदारी से काम करने का, कानून का सम्मान करने का, प्रकृति की रक्षा करने का, सामाजिक सद्भाव बनाए रखने का, सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझने का, भ्रामक सूचनाओं से सावधान रहने का और अपने देश को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभाने का।

-गोपेश शर्मा

यह लेखक के अपने विचार हैं 

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