तपते भारत के सामने बड़ी चुनौती

सदी के अंत तक हालात भयावह

तपते भारत के सामने बड़ी चुनौती

वर्तमान में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। देश के कई शहरों में पारा 45 डिग्री के पार पहुंच गया है, जिसके और बढ़ने की आशंका है।

वर्तमान में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। देश के कई शहरों में पारा 45 डिग्री के पार पहुंच गया है, जिसके और बढ़ने की आशंका है। हालात की भयावहता का मंजर यह है कि दुनिया के सबसे गर्म शहरों में 19 भारत के हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर संकेत दे रही है। इतनी बड़ी तादाद में एकसाथ दुनिया के इतने शहरों का अत्यधिक गर्म होना जलवायु परिवर्तन का सीधा-साधा संकेत है। इसे सामान्य गर्मी मानकर दरगुज़र नहीं किया जा सकता, बल्कि यह भविष्य के खतरनाक ट्रेंड की एक झलक मात्र है।

वह बात अलग है कि मानसून के चलते इसमें कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इसकी तीव्रता समय के साथ बढ़ती ही जाएगी। आज स्थिति यह है कि उत्तर भारत के अनेक शहरों में तापमान कहीं 43 तो कहीं 44.5 डिग्री सेल्सियस से भी पार कर गया है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में तो पारा 46 तक पहुंच गया है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी की मानें तो आने वाले दिनों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाएगा। चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक गर्मी के गंभीर, जानलेवा परिणाम होंगे। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सलाटा इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी के शोधपत्र के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते भारत में गर्मी का सबसे बुरा दौर अभी आना बाकी है। शोध-अध्ययन के अनुसार, साल 1980-90 और 2015 से 2024 के बीच भारत में तापमान 0.88 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। इसके लिए वायु प्रदूषण को जिम्मेदार माना गया है। निकट भविष्य में इसका दायरा और भी तेजी से बढ़ेगा।

4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म :

दुनिया के शोध-अध्ययन यह प्रमाणित करते हैं कि मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। क्लाइमामीटर की रिपोर्ट में 1950 के बाद से अब तक हीटवेव की भयावहता और उसके कारणों का विश्लेषण करने के बाद खुलासा किया गया है कि 1950 और 2000 के बीच की हीटवेव और मौजूदा हीटवेव में काफी अंतर चुका है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने में यूरोपीय मौसम विज्ञान एजेंसी कोपरनिकस के एफअ आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। इसके अनुसार मौजूदा हीटवेव पहले की तुलना में चार डिग्री अधिक गर्म हो चुकी है, जिससे मानव स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा पैदा हो गया है। इसके लिए मानव-जनित जलवायु परिवर्तन पूरी तरह जिम्मेदार है, जबकि प्राकृतिक कारणों की भूमिका लगभग नगण्य है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ-साथ मौसम में कई बदलावों का उल्लेख किया गया है, जैसे सतह के वायु दबाव में वृद्धि, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न में परिवर्तन। इसके अलावा नमी का बढ़ना और हवाओं की गति में अचानक कमी भी देखी गई है। पिछले 80 वर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्यधिक गर्मी वाले दिनों की संख्या भी तीन गुना हो गई है। 1940 के दशक में वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना औसतन लगभग 15 दिन अत्यधिक गर्मी देखी जाती थी, लेकिन आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष से अधिक हो गया है।

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लू से हर साल करीब डेढ़ लाख मौतें :

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हर साल दुनिया में 1.53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इनमें से पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं, जहां करीब 14 फीसदी मौतें होती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले तीन दशकों में हर साल औसतन 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया में और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में दर्ज की गई हैं। स्विट्जरलैंड स्थित ईटीएच ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि यदि भविष्य में प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां इसी तरह बढ़ती रहीं, तो लू से होने वाली मौतों की संख्या और बढ़ सकती है। पिछले 20 वर्षों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच चुका है।

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अस्सी फीसदी आबादी हीटवेव की जद में :

हीटवेव की तीव्रता और घातकता की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि इससे निपटने के लिए त्वरित कार्रवाई नहीं की गई, तो भारत को सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्यधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और मौत तक हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, महिलाएं, फेफड़ों की पुरानी बीमारी से पीड़ित लोग तथा निर्माण और श्रम से जुड़े लोग अधिक आते हैं। इन पर जोखिम ज्यादा रहता है।

सदी के अंत तक हालात भयावह :

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार, जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण यदि 2050 तक यही स्थिति बनी रही, तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर पर पहुंच जाएगी, जिससे लाखों लोगों की मौत हो सकती है। प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में वृद्धि से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव घटनाएं बढ़ सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार, यदि धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है, तो 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 43 फीसदी की कमी जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ, जिसकी आशंका अधिक है, तो सदी के अंत तक धरती का तापमान चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। उस स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या धरती रहने लायक बच पाएगी? चिंता की असली वजह यही है।

- ज्ञानेन्द्र रावत

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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