जानलेवा बनता जा रहा बढ़ता तापमान
तापमान वृद्धि की दर
बढ़ता तापमान अब जानलेवा बनता जा रहा है। देखा जाए तो मौजूदा दौर में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है।
बढ़ता तापमान अब जानलेवा बनता जा रहा है। देखा जाए तो मौजूदा दौर में देश हीटवेव की भीषण चपेट में है। असलियत में हीटवेव कहें, उष्ण लहर कहें या फिर लू कहें, की तीव्रता और घातकता में दिनोंदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। बढ़ते तापमान और गर्म हवा के भीषण थपेड़ों ने दिन तो दिन रातों में भी जीना हराम कर दिया है। रातों में भी लू जैसे हालात से लोग चैन की नींद तक नहीं ले पा रहे हैं। मौसम विभाग भी कह रहा है कि अगले हफ्ते तक इस गर्मी से निजात मिल पाना संभव नहीं है। और तो और आने वाले दिनों में पारा 47-48 डिग्री को भी पार कर जायेगा, ऐसी आशंका है। जहां तक देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सवाल है, वहां तापमान 45 डिग्री के ऊपर पहुंच गया है। वह तप रही है और आग की भट्टी बनकर रह गयी है। मौसम विभाग की मानें तो इस हफ्ते देश के उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत और देश के कई हिस्सों यथा पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, विदर्भ, मराठवाडा, मध्य महाराष्ट्र, बिहार और तेलंगाना के कुछ हिस्सों को भीषण लू का सामना करना पड़ेगा। यही नहीं तापमान में अगले दिनों में धीरे धीरे दो से चार डिग्री तक की बढ़त हालात को और विषम बना देगी।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका :
प्राकृतिक कारणों से उपजे जलवायु परिवर्तन की भूमिका लगभग नगण्य ही है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में हीटवेव के साथ साथ मौसम में भी कई बदलाव देखे जाने का उल्लेख है। इनमें सतह के वायु दबाव में बढ़ोतरी, हवाओं की गति और तापमान के पैटर्न मैं हुए काफी बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट की मानें तो इन बदलावों में नमी का बढ़ना, हवाओं की गति में यकायक कमी और सर्दी प्रमुख है। इसके अलावा पिछले 80 वर्षों में दुनिया के महानगरों में अत्याधिक गर्मी का अनुभव करने वाले दिनों की तादाद भी तीन गुणा हो गयी है। दरअसल 1940 के दशक में औसतन वैश्विक समुद्री सतह पर सालाना लगभग 15 दिन अत्याधिक गर्मी देखी जाती थी, लेकिन वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण आज यह आंकड़ा बढ़कर 50 दिन प्रति वर्ष हो गया है। प्रोसीडिंग्स आफ द नेशनल एकेडेमी आफ साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अब समुद्री हीटवेव लम्बे समय तक सामान्य से काफी ऊपर रहती है। यह भी कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी के चलते अत्याधिक समुद्री गर्मी की घटनाएं लम्बे समय तक बनी रहती हैं।
आशंका को नकारा नहीं जा सकता :
असलियत में तापमान में बढ़ोतरी से घातक लू चलने की घटनाओं में बीते दशकों में तेजी से वृद्धि हुई है। बीते दो दशक तो लू से मरने वालों की तादाद में हुई बढ़ोतरी के जीते जागते सबूत हैं। हर साल दुनिया में 1. 53 लाख से ज्यादा लोगों की मौत लू के कारण होती है। इसमें पांचवें हिस्से से अधिक मौतें भारत में होती हैं। भारत के बाद चीन और रूस में लू से जुड़ी मौतें सर्वाधिक हैं। यहां करीब 14 फीसदी मौतें हुयी हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार पिछले तीन दशक में हर साल कुल 1,53,078 लोगों की मौत लू से हुई है। यह भी कि हर साल गर्मियों में होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी एशिया से और 30 फीसदी से अधिक यूरोप में हुई हैं। फिर जलवायु परिवर्तन ने एशिया में हीटवेव की तीव्रता को काफी बढा़ने में अहम भूमिका निबाही है। इससे अरबों लोग प्रभावित हुए हैं। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता।
नए अध्ययन में यह खुलासा :
ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के नये अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया में यदि इसी प्रकार प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की घटनाओं में और बढ़ोतरी हुयी तो उससे लू सम्बन्धी मामलों में मृत्यु दर बढ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। गौरतलब है 2003 में यूरोप में 47.5 डिग्री सेल्सियस तापमान पहुंच गया था जिससे लू लगने के दौरान 45 हजार लोगों की मौत हो गयी थी। बीते 20 सालों में यह आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। इसके अलावा 2013 से यूरोप, दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा सहित दुनिया के 47 देशों के 748 शहरों में गर्मी से सम्बन्धित मृत्यु दर सम्बन्धी आंकड़े के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि लू की घटनाओं में कहीं भी कमी नहीं आयी है और वहां लू से मरने वालों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई आक्साइड में हुई रिकार्ड बढ़त और तापमान में लगातार होती बढ़ोतरी के चलते हीटवेव की भयावहता की आशंका व्यक्त की है।
तापमान वृद्धि की दर :
दरअसल, हीटवेव की जद में देश की 80 फीसदी आबादी और 90 फीसदी क्षेत्रफल आने की आशंका व्यक्त की गयी है। विशेषज्ञों की मानें तो हीटवेव की स्थिति मानव शरीर के लिए अत्याधिक खतरनाक होती है। इससे डिहाईड्रेशन, हीटस्ट्रोक और मौत भी हो सकती है। इसकी चपेट में बच्चे, 80 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्ग, विशेष रूप से महिलाएं, फेफड़े की पुरानी बीमारी वाले, निर्माण और श्रम से जुड़े लोग ज्यादा आते हैं। इन पर हीटवेव का जोखिम ज्यादा रहता है। फिर पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं है कि बीते बरसों में हर महाद्वीप को हीटवेव ने प्रभावित किया है। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी हुई। साल 1992 से लेकर अभी तक लू के चलते तकरीब 24 हजार लोगों की मौतें हुयी हैं। आने वाले सालों में 60 करोड़ लोग इससे सर्वाधिक प्रमावित होंगे। इससे 31 से 48 करोड़ लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कमी दर्ज की जायेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की मानें तो 2027 तक पूरी दुनिया में रिकार्ड तोड़ गर्मी की आशंका है। चिंता की बात यह है कि यदि तापमान वृद्धि की दर पर अंकुश नहीं लगा तो सदी के अंत तक गर्मी से 1. 5 करोड़ लोग मौत के मुहाने तक पहुंच जायेंगे। कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि जीवाश्म ईंधन कंपनियों द्वारा तेल और गैस का उत्सर्जन स्तर यदि 2050 तक यही रहा तो 2100 तक गर्मी अपने घातक स्तर तक पहुंच जाएगी। उसका नतीजा लाखों लोगों की मौत होगा। यह भी कि प्रत्येक मिलियन टन कार्बन में बढो़तरी से दुनिया भर में 226 अतिरिक्त हीटवेव की घटनाओं में बढो़तरी होगी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति के अनुसार धरती के गर्म होने की रफ्तार अनुमान से कहीं ज्यादा है। अहम सवाल कार्बन उत्सर्जन कम करने का है, यदि ऐसा नहीं हुआ जिसकी संभावना अधिक है। उस दशा में सदी के आखिर तक धरती का तापमान बढ़कर चार डिग्री सेल्सियस पहुंच जायेगा। उस दशा में धरती रहने काबिल बची रह पायेगी।
-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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